विषय ……विश्वासघात
दिनांक……. 18 . 8 . 2026
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विश्वासघात केवल एक शब्द नहीं,
यह आत्मा पर अंकित वह मौन आघात है,
जिसकी पीड़ा का कोई स्वर नहीं होता,
पर जिसकी प्रतिध्वनि
मन के एकांत में बहुत दूर तक जाती है।
विश्वास जब किसी के चरणों में रख देते हैं,
तो केवल अपना विश्वास नहीं देते—
अपने हृदय का एक अंश सौंप देते हैं।
और जब वही विश्वास छल की धूल में मिल जाता है,
तो टूटता केवल संबंध नहीं,
मनुष्य का भीतर का भरोसा भी टूट जाता है।
विश्वासघात की पीड़ा
अश्रुओं से अधिक मौन होती है,
क्योंकि आँसू तो बहकर समाप्त हो जाते हैं,
पर स्मृतियाँ बार-बार लौटकर
वही प्रश्न करती हैं—
“जिसे अपना समझा,
क्या वह कभी अपना था भी?”
छल करने वाला शायद
अपने अपराध को भूल जाए,
किन्तु जिसे छल मिला,
वह हर सत्य के पीछे
एक संशय खोजने लगता है।
फिर भी जीवन यही सिखाता है—
किसी के विश्वासघात से
अपने हृदय की निर्मलता को मत खोना।
क्योंकि छल उसका कर्म था,
पर विश्वास करना तुम्हारी सुंदरता।
जिसने तुम्हें तोड़ा,
उसे अपने भीतर विष बनाकर मत रखना;
क्षमा कर सको तो कर देना,
पर अपनी स्मृति से वह सीख
कभी मिटने मत देना।
क्योंकि विश्वासघात
संबंध का अंत मात्र नहीं,
कभी-कभी आत्मबोध का आरंभ भी होता है—
जहाँ मन पहली बार समझता है
कि हर अपना कहलाने वाला
अपना नहीं होता,
और हर टूटना
मनुष्य को बिखेरने नहीं,
उसे भीतर से और अधिक
सुदृढ़ बनाने आता है।
************ स्वरचित कविता
दीपा सिंह गौतम
गंजबासौदा मध्य प्रदेश से







