एकता में ही जीवन का आधार

एकता में ही जीवन का आधार

एक विशाल पर्वत की तलहटी में सुंदर वृक्षों से घिरा एक शांत वन था। वहाँ ‘द्विशिर’ नाम का एक अनोखा पक्षी निवास करता था। प्रकृति ने उसे एक ही शरीर दिया था, परंतु उसके दो मस्तक थे। दोनों मस्तक एक ही पेट और प्राण से जुड़े थे, फिर भी उनके विचारों में कभी मेल नहीं बैठता था। एक यदि उत्तर की ओर उड़ना चाहता, तो दूसरा दक्षिण की ओर ज़िद ठान लेता। आपसी खींचतान के कारण वे अक्सर भटक जाते थे।

एक दोपहर, नदी तट के पास उड़ते हुए पहले मस्तक की दृष्टि एक दुर्लभ, मीठे फल पर पड़ी। उसने उत्सुकता में उसे उठाकर खा लिया। रस इतना स्वादिष्ट था कि वह तृप्त हो गया।

यह देखकर दूसरे मस्तक ने निवेदन किया, “मित्र! मुझे भी इसका थोड़ा रस लेने दो, ताकि मैं भी इस अद्भुत स्वाद का आनंद उठा सकूँ।”

पहले मस्तक ने अहंकारवश कहा, “इसे पहले मैंने देखा है, इसलिए इस पर केवल मेरा अधिकार है। तुम्हें माँगने की आवश्यकता नहीं है।”

दूसरे मस्तक ने धैर्य से कहा, “हमारा पेट तो एक ही है। यदि तुम खाओगे तो पोषण पूरे शरीर को ही मिलेगा, परंतु स्वाद का आनंद मुझे भी मिलना चाहिए। बाँटकर खाने से प्रेम बढ़ता है।”

किंतु पहला मस्तक अपनी हठ पर अड़ा रहा और उसने अकेला ही पूरा फल समाप्त कर दिया। इस बात से दूसरा मस्तक भीतर ही भीतर आहत हुआ और उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी।

कुछ समय बीतने के बाद, दूसरे मस्तक को एक झाड़ी में एक चमकीला, किंतु अति विषैला फल मिला। वह उसे अपनी चोंच में उठाने ही लगा था कि पहले मस्तक की नज़र उस पर पड़ी।

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पहला मस्तक भयभीत होकर चिल्लाया, “रुको! अनर्थ मत करो! यह प्राण घातक विषैला फल है। इसे खाते ही हम दोनों की जीवन-लीला समाप्त हो जाएगी!”

दूसरे मस्तक ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा, “उस दिन जब तुमने मीठा फल अकेले खाया था, तब तुम्हें हमारे साझा जीवन का ध्यान नहीं आया। आज मैं इसे खाकर अपना अपमान भूलना चाहता हूँ।”

पहले मस्तक ने हाथ जोड़कर बहुत प्रार्थना की कि क्रोध में आकर पूरे शरीर का सर्वनाश न करे, परंतु प्रतिशोध के अंधकार में दूसरे मस्तक को विवेक की कोई बात समझ नहीं आई। उसने हठपूर्वक वह ज़हरीला फल निगल लिया।

क्षणभर में विष का प्रभाव पूरे शरीर में फैल गया। दोनों मस्तक तड़पने लगे और अंततः उस अनोखे पक्षी ने अपने प्राण त्याग दिए। दोनों की आपसी शत्रुता और अहंकार ने मिलकर उनके ही अस्तित्व को सदा के लिए मिटा दिया।

सीख:

जहाँ ईर्ष्या, प्रतिशोध और व्यक्तिगत अहंकार प्रवेश कर जाता है, वहाँ विनाश निश्चित हो जाता है। परिवार, संगठन या समाज तभी तक सुरक्षित और समृद्ध हैं, जब तक उनमें परस्पर सम्मान और सहकारिता की भावना बनी रहती है।

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शायरी

आपसी फूट से घर के मकान टूट जाते हैं,

ज़रा से वहम से बरसों के रास्ते छूट जाते हैं।

न कर तू बदले की आग में अपनों से दुश्मनी,

जहाज़ डूबता है तो दोनों सिर डूब जाते हैं॥

जहाँ ईर्ष्या और अहंकार की दीवार उठती है,

वहाँ मोहब्बत की हर एक साफ़ नीयत लुटती है।

एकता ही जीवन की असली ताक़त है यारों,

वरना हठ की आग में पूरी ज़िंदगी सुलगती है॥

— लेखिका रेखा तोमर मैहर

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