श्रीकृष्ण वंदना: बंशीधर की महिमा

अधरों पर बंशी और मस्तक पर मुकुट सजा है जिसका, इस सृष्टि के कण-कण में नाम अमर है जिसका।

चेतना का आधार: भगवान श्री कृष्ण

सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक, प्रलय से लेकर सृजन तक, यदि किसी एक ऊर्जा ने संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी आकर्षण शक्ति से बांध रखा है, तो वे त्रिगुणातीत, लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण हैं। उनका नाम लेते ही मन में एक असीम शांति, कानों में बाँसुरी की मोहक तान और नेत्रों के समक्ष सांवले सलोने रूप की छवि उभर आती है।

वे केवल एक ऐतिहासिक पात्र या पौराणिक देवता नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक मनुष्य के भीतर निवास करने वाली वह अंतरात्मा हैं जो हमें सही और गलत का बोध कराती है। कृष्ण का अर्थ ही है— जो सबको आकर्षित करे। जब-जब धरती पर अधर्म, अन्याय और अहंकार का अंधकार बढ़ता है, तब-तब वे धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। सच्ची श्रीकृष्ण वंदना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देने का एक पावन मार्ग है।

बाल्यकाल की लीलाएं और धर्म की रक्षा

गोकुल और वृंदावन की गलियां आज भी श्रीकृष्ण के बाल-चरणों की धूल को अपने माथे से लगाकर धन्य महसूस करती हैं। मैया यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चलते कान्हा का रूप, माखन चुराते समय उनकी मासूमियत, और ग्वाल-बालों के साथ उनकी बाल-क्रीड़ाएं—यह उस परब्रह्म का अपने भक्तों के साथ वात्सल्य रस का अनंत विस्तार था।

जब वे यमुना के तट पर अपनी वंशी बजाते थे, तो वृक्ष, पशु-पक्षी और नदियां तक अपनी गति भूलकर उस नाद में तल्लीन हो जाती थीं।

मथुरा से द्वारका तक: धर्म, न्याय और नेतृत्व कृष्ण केवल माखनचोर ही नहीं हैं, वे कूटनीति के प्रकांड पंडित, धर्म के सच्चे रक्षक और प्रजापालक राजा भी हैं। कंस का वध करके उन्होंने मथुरा को अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। सुदामा जैसे गरीब मित्र के आने पर राजसिंहासन छोड़कर नंगे पांव दौड़ना सच्ची मित्रता की वह मिसाल है, जो युगों-युगों तक मानव जाति का मार्गदर्शन करती है।

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श्रीकृष्ण वंदना

महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता का संदेश

कौरवों और पांडवों के महासंग्राम में जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर हथियार डाल देते हैं, तब रणक्षेत्र में सारथी बनकर खड़े होते हैं पार्थ के सखा कृष्ण। कुरुक्षेत्र में उन्होंने जो ज्ञान दिया, वह संपूर्ण मानव जाति के लिए जीवन का सबसे बड़ा दर्शन बन गया।

श्रीमद्भागवत गीता के रूप में उन्होंने कर्म, योग, भक्ति और ज्ञान का जो त्रिवेणी संगम प्रवाहित किया, वह हर व्यक्ति के लिए संजीवनी है। भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फलों पर नहीं)। यह सिद्धांत मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर निष्काम भाव से जीने की प्रेरणा देता है।

भक्ति मार्ग और जीवन का अंतिम सत्य

भक्ति मार्ग में भगवान कृष्ण का स्थान अद्वितीय है। मीराबाई का सर्वस्व त्याग हो या सूरदास जी का बाल-लीलाओं का सजीव वर्णन, यह इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण को देखने के लिए बाहरी नेत्रों की नहीं, बल्कि भीतर की निर्मल भक्ति की आवश्यकता होती है।

आज की इस आपाधापी भरी और तनावपूर्ण जिंदगी में मनुष्य मानसिक शांति की तलाश में भटक रहा है। ऐसे में यदि कोई एक नाम हमें पुनः शांति से जोड़ सकता है, तो वह केवल ‘कृष्ण’ है। आइए, हम सब मिलकर उस बांके बिहारी के चरणों में अपनी निष्ठा अर्पित करें:

हे मुरलीधर! हे नंदनंदन! हमारी हर सांस पर आपका अधिकार हो, आपके चरणों की धूलि ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा श्रृंगार हो।

©️ लेखिका: रेखा तोमर दिनांक: 3 सितंबर 2026

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