कटते जंगल cutting down forests आज के समय में जब कंक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं, तब वनों की कटाई को रोककर ‘पर्यावरण संरक्षण’ करना हम सबकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। आइए पढ़ते हैं इस विषय पर एक बेहद मार्मिक और मार्गदर्शक कहानी।
हरे-भरे पेड़ों को काट कर जो अपनी इमारत बनाते हैं, वो अपने ही हाथों से अपनी सांसों की डोर मिटाते हैं।
पेड़ों की छांव और विद्या देवी का मौन
गांव के छोर पर स्थित पुराने पीपल और नीम के पेड़ों की छांव में विद्या देवी चुपचाप अपनी पोती के साथ आंगन में बैठी थीं। तभी उनका बेटा अभय हाथ में अखबार लिए हड़बड़ाता हुआ घर के अंदर आया और बोला, “माँ, आप यहाँ धूप में क्यों बैठी हो? अंदर चलो न।”
विद्या देवी ने अपनी स्नेह भरी निगाहों से बेटे को देखा और बोलीं, “बेटा, धूप में नहीं, मैं तो इन पेड़ों की छांव में सुकून ढूंढ रही हूँ। लेकिन जिस रफ्तार से हमारे गांव के आसपास के जंगल काटे जा रहे हैं, डर है कि आने वाले दिनों में यह छांव भी नसीब नहीं होगी।”
विकास बनाम विनाश की बहस
अभय ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “माँ, विकास के लिए जंगल काटना तो जरूरी है। नई सड़कें बनेंगी, बड़े-बड़े मकान और कारखाने आएंगे तभी तो तरक्की होगी।”

विद्या देवी ने एक गहरी सांस ली और समझाते हुए बोलीं, “बेटा, सीमेंट और कंक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए तुम असली और जीवंत जंगलों की बलि दे रहे हो। क्या तुम्हें याद नहीं, जब तुम्हारे बाबा हुआ करते थे, तब यहाँ का मौसम कितना सुहाना हुआ करता था? हर तरफ पक्षियों की चहचहाहट गूंजती थी।”
उन्होंने आगे कहा, “आज पेड़ों के कटने से न सिर्फ छांव छीनी है, बल्कि हवा भी जहरीली होती जा रही है। जब सांस लेने के लिए शुद्ध हवा ही नहीं बचेगी, तो यह विकास किस काम का?”
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हृदय परिवर्तन और ‘पेड़ बचाओ’ का संकल्प
विद्या देवी के इन सादे लेकिन गहरे शब्दों ने अभय के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा पैदा कर दिया। वह अपनी माँ के इस मौन और उनके उदास चेहरे के पीछे छिपे दर्द को समझ गया।
माँ को वहीं छोड़कर अभय अपने कमरे में चला गया, लेकिन उसका मन बेचैन हो गया। उसने खिड़की से बाहर देखा— दूर एक ठेकेदार की आरी से पुराना बरगद का पेड़ जमीन पर गिरने ही वाला था।
शाम को जब अभय वापस लौटा, तो उसके हाथ में पेड़ों के पौधे और कुछ खास तख्तियाँ थीं जिन पर लिखा था— “पेड़ बचाओ, जीवन बचाओ।”
उसने अपनी माँ के चरणों में पौधे रखकर कहा, “माँ, आपकी बात आज मुझे समझ आ गई। विकास का मतलब प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। कल से मैं और मेरे साथी गांव में बड़े पैमाने पर ‘पर्यावरण संरक्षण’ और पौधरोपण अभियान शुरू कर रहे हैं।”
बेटे के इस बदलाव को देखकर विद्या देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा और उसे दिल से आशीर्वाद दिया।
निष्कर्ष: प्रकृति का संदेश
पेड़ कटेंगे धरती पर तो जीवन रूठ जाएगा, सांसों की हर एक डोर से अपना नाता छूट जाएगा। संभल जाओ अभी वक्त है, हर आंगन पेड़ लगाओ तुम, धरती को फिर से स्वर्ग बनाकर अपना फर्ज निभाओ तुम।
©️ लेखिका: रेखा तोमर दिनांक: 3 सितंबर 2026








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