मेरे गाँव का दर्द
8-10-2026
मेरा सपना
एक बार बहुत पहले मुझे अपने पैतृक गाँव जाने का सौभाग्य मिला। मैं बचपन से ही शहर में पली और बड़ी हुयी। शिक्षा – दीक्षा भी शहर में हुयी।
बड़े होने पर जब मुझे अपने गाँव जाने का मौका मिला तो मैं बहुत खुश थी। क्योंकि अभी तक तो मैंने किताबों में ही गाँव के बारे में पढ़ा था कि गाँव बहुत सुन्दर होते हैं। ताज़ी स्वच्छ शीतल हवा होती है। घर में उगाई ऑर्गेनिक सब्जियाँ होती है।
मैं यही सपना देखते – देखते गाँव पहुँच गयी। हमारा घर सड़क के किनारे पर ही था तो ज्यादा चलना नहीं पड़ा और थोड़ा चलकर हम घर पहुँच गये। हमारा गाँव बहुत बड़ा था। हम शाम को पहुँचे तब सब बहुत सुन्दर लग रहा था। हमारे मकान में मेरे पापा के चाचाजी रहते थे तो हमारे वाला घर का हिस्सा भी उन्हीं के पास था।
हमारा घर
हम घर पहुँचे तो गए छोटी दादी और चाची ने हमें चाय नाश्ता कराया और कुछ देर बाद चाची खाना लेकर आ गयी। चूल्हे पर बनी रोटी की खुशबु मुझे बड़ी पसंद आयी और उसके ऊपर दादी ने इतना बड़ा घीं का टुकड़ा रख दिया। पहाड़ों में बहुत ठण्ड होती है तो घीं जम जाता है और फिर टुकड़ों में ही निकलता है।
हम ने खाना खाया और सब लोग सो गए। सुबह जब में उठी तो देखा चाची पानी भरने धारा (जहाँ पर जमीन के अंदर से स्वतः) ही पानी निकल कर एक पतली धार के रूप में निकलता है उसे धारा कहते हैं। मैं भी चाची के साथ चली गयी। वापस आते समय चाची तो आराम से पानी से भरा बर्तन सर पर रख कर आ गयी और मुझे खाली आने में भी बड़ी मुश्किल हुयी।
प्रधान जी का घर और उनका दर्द
नाश्ता करने के बाद बड़े लोग बातेँ करने लगे में चाचा जी की बेटी और बेटे के साथ गाँव घूमने चली गयी। गाँव में एक से एक सुन्दर लड़की पर नक्काशी वाले घर थे। काफी घरों पर ताले लगे हुए थे। और काफी घर खंडहर में भी बदल गए थे। कुछ देर बाद हम एक बड़े से घर में पहुँचे। तो मेरी चाची की बेटी ने मुझे बताया कि ये गाँव के प्रधान जी का घर है। प्रधान जी के दो बेटे हैं दोनों दिल्ली में रहते है अपने परिवार के साथ।
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घर में सिर्फ बूढ़े प्रधान जी और उनकी पत्नि रहती है। खेत बगैरह सब उन्होंने गाँव वालों को बटाई में दे रखी थी उसी से उन्हें फ़सल का एक हिस्सा मिल जाता था उससे दोनों का गुजारा आराम से हो जाता था।
मैं उस घर को देखती रह गयी। खिड़की, दरवाजों पर क्या नक्काशी करी हुयी थी। छज्जे पर प्रधान जी की पत्नि बैठी हुयी थी। वह घर नहीं एक कोठी थी समझों। प्रधान जी की पत्नि ने मेरे बारे में पूछा कि मैं कौन हूँ तो मेरी बहन ने मेरे पापा का नाम लेकर कहा कि मैं उनकी बेटी हूँ कल रात ही ये लोग आए हैं।
उन्होंने बड़े प्यार से हमें अन्दर बुलाया और मिठाई खाने के लिए दी। घर की सुंदरता देखकर मेरा मन उसे पूरा देखने का हुआ तो उन्होंने मुझसे कहा जा देख ले। मैंने उस घर का एक – एक कोना छान मारा। वह घर तीन मंजिल का था और कमरे तो मैंने गिने ही नहीं। अन्दर एक बड़ा कमरा था जो भंडार घर था। जब मैं उसके अंदर गयी तो मैं देखती रह गयी। वह पूरा बर्तनों से भरा हुआ था। इतने बड़े- बड़े बर्तन की पूरे गाँव का खाना एक बार ही बन जाय।
तब मेरी बहन ने बताया कि गाँव में कुछ भी कार्यक्रम होता है तो बर्तन प्रधान जी के घर से ही आते हैं। पहले तो प्रधान जी सारी व्यवस्था खुद देखते थे पर अब उम्र हो गयी और बच्चे शहर चले गए तो जीवन में उमंग नहीं रही। फिर भी अभी वह थोड़ा बहुत तो देखते ही हैं।
वह इतनी बड़ी कोठी थी और उसमें रहने वाले सिर्फ दो लोग। मैंने सोचा कितने अरमानों से ये कोठी बनाई होगी कि बच्चे यहाँ रहेंगे। आँगन में बच्चों की हँसी ठिठोली चलती रहेगी और पता नहीं क्या – क्या। अब सिर्फ दो लोग रहते थे फिर इनके बाद इस घर और इतने समान का क्या होगा इनके बेटे इसे बेचकर चले जाएंगे। सोचकर बहुत दुख हुआ।
गाँव के खंडहर होते घर और दम तोड़ती हमारी संस्कृति
गाँव के खंडहर हुए घरों के बारे में बहन मुझे बताती रही कि ये किसका घर है ये उसका घर है। इतने सुन्दर बड़े – बड़े घर घरवालों के चले जाने से उनकी देखरेख ना हो पाने के कारण खंडहर में बदल रहे थे। उनके खंडहर होने के साथ – साथ हमारी संस्कृति भी दम तोड़ रही थी।
हमारी नकारत्मक सोच
गाँव से लोग नौकरी की की तलाश में शहर चले गए और कुछ अब जाने के तैयारी कर रहे थे। एसा नहीं था कि गाँव में फसल नहीं होती है होती है अच्छी होती है। पर अब मेहनत मजदूरी कौन करे इसलिए लोग नौकरी की तलाश में शहर जाने लगे थे। शहर में भले ही छोटी ही नौकरी मिले पर आराम है तो गाँव में कौन मिट्टी में जुझे ।
गाँव की परेशानियाँ
मेरी बहन ने मुझे बताया कि पहले काफी फल – फूल होते थे। पर अब क्या हुआ सरकार ने शहरों से बन्दर पकड़
कर लाकर जंगल के बीच में छोड़ने के बजाय यही जंगल के किनारे पर छोड़ दिए। अब वे बन्दर पेड़ पर एक भी फल नहीं लगने देते हैं छोटा सा ही फल क्यूँ ना हो आधा खाकर बर्बाद कर देते हैं। जंगल कम होने से जंगली पशु सुवर जैसे पशु सारी फ़सल नष्ट कर देते हैं और जमीन तक खोद डालते हैं।
गाँव में कोई सुविधा नहीं है दवाखाने में डॉक्टर नहीं मिलता है। इसलिए लोग गाँव छोड़कर जा रहे हैं। क्योंकि जब गाँव में फसल नहीं होगी तो वे क्या करेंगे। ये सब देखकर मुझे बहुत दुख हुआ क्योंकि गाँव का हर खंडहर होता घर अपने अंदर एक कहानी को समेटे हुए था।
जैसे हालात थे उससे तो यही लग रहा था कि जल्दी ही हमारा गाँव विरान हो जाए गा। फिर ये खंडहरों का गाँव कहलायेगा।
रिवर्स पलायन
हमारे पहाड़ के गाँव पलायन की मार झेल रहे हैं। यही हाल रहा तो पहाड़ के अधिकांश गाँव विरान हो जाएंगे। हम लोग इसे बचा सकते हैं। बीच – बीच में अपने गाँव जाएं और जब रिटायर हो जाएं तो अपने गाँव लौट जाएं। वहीं रहें। अगर वहाँ लोग रहेंगे तो उनके बच्चे भी छुट्टियों में ही सही गाँव अवश्य आयेंगे। जिससे गाँव विरान नहीं होंगे।
सरकार को भी रिवर्स पलायन पर ध्यान देना चाहिए। जो सुविधाएँ शहर वालों को मिल रही है वह गाँव मैं भी मिलनी चाहिए। इससे शहरों का बोझ भी कुछ तो कम अवश्य होगा। और हमारे गाँव आबाद रहेंगे। जो लोग गाँव में रहते हैं उन्हें वहीं स्वरोजगार के लिए सस्ते दर पर लोन मिलना चाहिए।
हमें विचार करना होगा
अगर हम सब लोग और सरकार मिल कर प्रयास करें तो कुछ भी असंभव नहीं है। हमारे गाँव उजड़ रहे हैं। हमें इस बारे में मिलकर सोचना होगा और उन्हें बसे रहने के लिए प्रयास करना होगा।
वरना वो दिन दूर नहीं जब हमारी धरोहर हमारी संस्कृति सब खत्म हो जाएंगे। हम अपनी जड़ों से दूर हो जाएंगे और बिना जड़ों से पेड़ कभी ज्यादा समय तक खड़ा नहीं रह सकता है। और हल्के से हवा के झौंके से जमीन पर गिर जाता है। विचार अवश्य कीजिएगा।
धन्यावाद 🙏
भावना भट्ट
स्वरचित और मौलिक
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Agar Bhawana Bhatt ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









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