भीड़ में अकेली
कभी-कभी जिंदगी में सब कुछ होते हुए भी ऐसा लगता है, जैसे हमारे पास कुछ भी नहीं है। चारों तरफ लोग होते हैं, बातें होती हैं, हँसी होती है, रिश्ते होते हैं, फिर भी दिल के किसी कोने में एक ऐसा सन्नाटा रहता है, जिसे कोई सुन नहीं पाता।
मैं भी उसी सन्नाटे के साथ जीना सीख गई हूँ।
मैंने भीड़ में अकेलापन देखा है। अपनों के बीच रहकर खुद को अकेला महसूस किया है। मैंने उन मुश्किलों का सामना किया है, जिनके बारे में सोचकर आज भी कभी-कभी आँखें भर आती हैं। फर्क बस इतना है कि पहले मैं हर दर्द पर टूट जाया करती थी, और अब आँसू पोंछकर खुद को संभालना सीख गई हूँ।
लोग अक्सर कहते हैं, “तुम अकेले क्या कर सकती हो?”
काश, वे मेरी जिंदगी के वे दिन देख पाते, जब मुझे संभालने वाला कोई नहीं था। जब मन में हजारों सवाल थे, आँखों में आँसू थे और फिर भी अगले दिन उठकर मुझे अपनी जिंदगी जीनी थी।
उन्हें क्या पता कि मैंने कितनी रातें रोते हुए बिताई हैं। कितनी बार खुद को समझाया है कि सब ठीक हो जाएगा, जबकि उस वक्त मुझे खुद नहीं पता होता था कि आखिर ठीक क्या होगा।
मैं कमजोर नहीं हूँ। बस मैंने अपनी लड़ाइयाँ अक्सर खामोशी से लड़ी हैं।
सबके लिए जीते-जीते, खुद को भूल गई
मैंने हमेशा सबका साथ चाहा। हर किसी की खुशी को अपनी खुशी से पहले रखा। किसी को बुरा न लगे, इसलिए कई बार अपनी बात भी अपने भीतर दबा ली।
मैंने लोगों की इज्जत की, उनकी बातें सुनीं, उनकी खुशियों में खुश हुई और उनके बुरे वक्त में उनके साथ खड़ी रही।
मुझे लगता था कि जब कभी मेरी जिंदगी में मुश्किल वक्त आएगा, तब यही लोग मेरा हाथ थामेंगे।
लेकिन शायद मैं भूल गई थी कि हम जिन रिश्तों को दिल से निभाते हैं, जरूरी नहीं कि वे भी हमें उसी दिल से निभाएँ।
मेरी जिंदगी में एक वक्त ऐसा भी आया, जब मुझे अपने लोगों की सबसे ज्यादा जरूरत थी। मैं भीतर से टूट रही थी। मेरे बारे में गलत बातें कही गईं, मुझे ऐसे शब्द सुनने पड़े, जिन्हें भूल पाना आसान नहीं था। मेरे सपनों को चोट पहुँची और मेरे आत्मसम्मान को भी।
लेकिन सबसे ज्यादा दर्द तब हुआ, जब मैंने उन लोगों को खामोश देखा, जिनसे मुझे उम्मीद थी कि वे मेरे लिए एक शब्द तो बोलेंगे।
उस दिन मुझे समझ आया कि कभी-कभी इंसान को दूसरों की कही बातों से उतनी तकलीफ नहीं होती, जितनी अपनों की खामोशी से होती है।
मैं सब सुनती रही। चुपचाप।
शायद इसलिए नहीं कि मेरे पास जवाब नहीं थे, बल्कि इसलिए कि मैं उन रिश्तों को टूटते हुए नहीं देखना चाहती थी, जिन्हें बचाने की कोशिश मैंने हमेशा की थी।
आज भी जब उन पलों को याद करती हूँ, तो मन में एक सवाल उठता है—मैंने उस वक्त खुद को कैसे संभाला होगा?
शायद उस दिन भी मैंने खुद से यही कहा होगा, “विधि, अभी हार मत मानना। अभी तुम्हें बहुत कुछ करना है।”
मेरी खामोशी के पीछे भी एक कहानी है
लोग मुझे हँसते हुए देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि मैं खुश हूँ। मुझे अकेले रहते देखते हैं, तो शायद सोचते हैं कि मुझे किसी की जरूरत नहीं।
लेकिन सच तो यह है कि हर मुस्कुराने वाला इंसान भीतर से खुश हो, यह जरूरी नहीं।
कुछ लोग अपने दर्द को शब्दों में कह देते हैं, और कुछ लोग उसे अपनी मुस्कान के पीछे छिपा लेते हैं।
मैं भी कई बार ऐसा ही करती हूँ।
कभी मन करता है कि कोई मेरे पास बैठे और बिना सवाल पूछे बस इतना कह दे, “तुम थक गई हो न? कोई बात नहीं, आज थोड़ा आराम कर लो।”
कभी मन करता है कि कोई मेरी आँखों में देखकर समझ जाए कि आज मैं ठीक नहीं हूँ। मुझे हर बार मजबूत बनने की सलाह देने के बजाय एक बार मेरा हाथ थाम ले।
लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी छोटी-छोटी ख्वाहिशें पूरी नहीं करती।
इसलिए मैंने धीरे-धीरे खुद को समझाना सीख लिया।
अब जब मन भारी होता है, तो कभी किताबें पढ़ती हूँ, कभी खुद से बातें करती हूँ और कभी चुपचाप बैठकर अपने विचारों को गुजरने देती हूँ।
मैंने सीखा है कि हर दर्द का जवाब तुरंत मिलना जरूरी नहीं। कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें समझने और उनसे बाहर निकलने में वक्त लगता है।
मेरी छोटी-छोटी खुशियाँ कहीं पीछे छूट गईं
मुझे भी छोटी-छोटी चीजों से खुशी मिलती थी।
दूसरी लड़कियों को सुंदर कपड़े पहने देखती, उनके हाथों पर नेल पेंट देखती, तो मेरा भी मन करता था कि मैं अपने लिए कुछ करूँ। मुझे मेहंदी लगाना बहुत पसंद था। त्योहारों पर अपने हाथों में मेहंदी सजाने का अपना ही सुकून था।
लेकिन जिंदगी की जिम्मेदारियों और पढ़ाई के बीच न जाने कब मेरी अपनी ख्वाहिशें पीछे छूटती चली गईं।
कभी किताबों में इतना खो जाती कि खुद के लिए वक्त ही नहीं मिलता। कभी लगता कि अभी ये सब छोड़ो, पहले अपने सपनों के लिए कुछ कर लो।
और ऐसे ही करते-करते कई बार मैं अपनी ही पसंद की चीजों को भूलने लगी।
दूसरों को अपनी पसंद के कपड़े पहनते, सजते-सँवरते और छोटी-छोटी खुशियों का आनंद लेते देखती, तो मन में एक हल्की-सी कसक उठती थी।
मैं भी तो ऐसी ही खुशियाँ चाहती थी।
मैं भी चाहती थी कि कभी बिना किसी चिंता के तैयार होऊँ, अपने हाथों पर मेहंदी लगाऊँ और सिर्फ इसलिए खुश हो जाऊँ क्योंकि आज मेरा मन खुश है।
लेकिन मैंने अपनी ख्वाहिशों को हमेशा के लिए छोड़ा नहीं है। शायद उन्हें पूरा करने का मेरा वक्त अभी आना बाकी है।
अब मैं समझने लगी हूँ कि सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना जरूरी है, लेकिन उस सफर में खुद की खुशियों को पूरी तरह भुला देना जरूरी नहीं।
आखिर मैं भी तो इंसान हूँ।
मुझे भी खुश होने का हक है।
दिवाली की रोशनी और मेरे भीतर का अँधेरा
दिवाली मेरा सबसे पसंदीदा त्योहार है।
मुझे सजे हुए घर, जलते हुए दीये और रोशनी से जगमगाती गलियाँ बहुत अच्छी लगती हैं। हर साल दिवाली का इंतजार करती हूँ।
लेकिन शायद कोई यह नहीं जानता कि इस त्योहार से मेरा रिश्ता सिर्फ खुशियों का नहीं, बल्कि कुछ अधूरे सपनों का भी है।
जब मैं दूसरों के घरों को सजा हुआ देखती हूँ, तो मेरे मन में एक ही ख्वाहिश आती है—एक दिन मेरा भी अपना घर होगा। एक ऐसा घर, जिसे मैं अपनी पसंद से सजाऊँगी। जिसके हर कोने में मेरी मेहनत, मेरे सपने और मेरी छोटी-छोटी खुशियाँ होंगी।
मैं दीये जलाऊँगी और उन्हें देखकर सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि अपने संघर्षों के बाद मिली खुशी महसूस करूँगी।
लेकिन दिवाली की रात कभी-कभी मेरे लिए अजीब भी हो जाती है।
बाहर पटाखों की आवाजें आती हैं। लोग खुशियाँ मनाते हैं। हर तरफ रौनक होती है। और मैं कुछ देर के लिए अपने कमरे में चली जाती हूँ।
वही कमरा, वही खामोशी और मेरे मन में चलती हुई हजारों बातें।
जिस रात का इंतजार मैं पूरे साल करती हूँ, कभी-कभी उसी रात मन सबसे ज्यादा शांत हो जाता है।
शायद इसलिए कि बाहर की रोशनी मुझे अपने भीतर के उन कोनों की याद दिलाती है, जहाँ आज भी कुछ अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं।
लेकिन फिर भी मुझे दिवाली पसंद है।
क्योंकि हर दीया मुझे याद दिलाता है कि अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी-सी लौ भी उसे चुनौती दे सकती है।
isse bhi padhein : वह अधूरी मुलाकात और खामोशियाँ
और मैं भी तो यही करना चाहती हूँ।
अपने हिस्से की थोड़ी-सी रोशनी ढूँढ़ना चाहती हूँ।
मैंने अकेले रहना नहीं, खुद का साथ देना सीखा है
एक वक्त था, जब मुझे लगता था कि अगर कोई मेरे साथ नहीं है, तो शायद मैं कुछ नहीं कर पाऊँगी।
मैं चाहती थी कि कोई मुझे समझे, मेरी बातें सुने और मुश्किल समय में मेरे साथ खड़ा रहे।
आज भी मैं चाहती हूँ कि मेरी जिंदगी में ऐसे लोग हों, जिनके सामने मुझे अपने आँसू छिपाने न पड़ें। जिनके सामने मुझे हर बार मजबूत होने का नाटक न करना पड़े।
लेकिन अब मैंने अपनी खुशी को दूसरों की मौजूदगी से बाँधकर रखना छोड़ दिया है।
मैंने खुद के साथ रहना सीखा है।
कभी किताबें मेरा सहारा बनती हैं, कभी मैं खुद से बातें करती हूँ और कभी अपने भविष्य के बारे में सोचकर खुद को समझाती हूँ कि अभी बहुत कुछ बाकी है।
अब अकेले बैठती हूँ, तो हर बार उदास नहीं होती। कभी-कभी खुद के साथ बिताया हुआ वक्त मुझे सुकून देता है।
मैंने जाना है कि अकेले होना और अकेला महसूस करना अलग-अलग बातें हैं।
अकेलापन तब चुभता है, जब दिल में बहुत कुछ हो और सुनने वाला कोई न हो। लेकिन खुद का साथ तब सुकून देता है, जब इंसान धीरे-धीरे खुद को समझना सीख जाता है।
मैं अब भी लोगों की कद्र करती हूँ। रिश्तों को महत्व देती हूँ। लेकिन अब खुद को खोकर किसी को खुश नहीं करना चाहती।
क्योंकि दूसरों का साथ निभाते-निभाते अगर मैं खुद से ही दूर हो जाऊँ, तो आखिर मेरे पास बचेगा क्या?
मैं टूटी जरूर हूँ, लेकिन हारी नहीं हूँ
मेरी जिंदगी में ऐसे दिन भी आए हैं, जब सब कुछ छोड़ देने का मन हुआ। कभी लगा कि इस माहौल से कहीं दूर चली जाऊँ। कभी लगा कि बस कुछ समय के लिए दुनिया से दूर होकर अपने मन को आराम दूँ।
ऐसे भी पल आए, जब मुझे समझ नहीं आता था कि अपनी तकलीफ किससे कहूँ।
लेकिन उन दिनों में भी मेरे भीतर एक छोटी-सी उम्मीद बची रही।
कभी वह उम्मीद मेरी किताबों में मिली, कभी मेरे सपनों में और कभी उस भविष्य की कल्पना में, जिसे मैं आज भी अपने लिए देखती हूँ।
मैं यह नहीं कहती कि मैं हमेशा मजबूत रहती हूँ। मैं भी थकती हूँ। मैं भी रोती हूँ। मुझे भी कभी-कभी किसी के सहारे की जरूरत होती है।
लेकिन मैंने धीरे-धीरे यह समझा है कि रो लेने से इंसान कमजोर नहीं हो जाता। मदद माँगने से उसकी ताकत कम नहीं होती। और कुछ समय के लिए थक जाना इस बात का सबूत नहीं कि वह अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता।
मेरे साथ जो हुआ, वह मेरी कहानी का एक हिस्सा है। वह मेरी पूरी पहचान नहीं है।
मैं अपनी जिंदगी को सिर्फ उन लोगों की वजह से याद नहीं रखना चाहती, जिन्होंने मेरा साथ नहीं दिया। मैं उसे उन सपनों के लिए याद रखना चाहती हूँ, जिन्हें पूरा करने की हिम्मत मैंने नहीं छोड़ी।
मैं चाहती हूँ कि एक दिन पीछे मुड़कर देखूँ और खुद से कह सकूँ—विधि, तुमने बहुत कुछ सहा, लेकिन तुमने अपने लिए जीने की उम्मीद नहीं छोड़ी।
अब मैं खुद को चुनना चाहती हूँ
आज अगर कोई मुझसे पूछे कि तुम्हें जिंदगी से क्या चाहिए, तो शायद मेरा जवाब पहले से थोड़ा अलग होगा।
पहले मैं चाहती थी कि सब खुश रहें। कोई मुझसे नाराज न हो। कोई मुझे गलत न समझे। मेरे अपने हमेशा मेरा साथ दें।
लेकिन अब मैं चाहती हूँ कि इन सबके बीच मैं खुद भी खुश रहूँ।
मैं अपनी पसंद की चीजें करना चाहती हूँ। अपने सपनों के लिए मेहनत करना चाहती हूँ। त्योहारों पर खुलकर खुश होना चाहती हूँ। अपने हाथों पर मेहंदी लगाना चाहती हूँ और एक दिन अपने सपनों का घर सजाना चाहती हूँ।
मैं चाहती हूँ कि मेरी जिंदगी में ऐसे रिश्ते हों, जहाँ मुझे अपनी अहमियत साबित न करनी पड़े।
जहाँ मेरी खामोशी को समझने की कोशिश की जाए और मेरी भावनाओं का मजाक न बनाया जाए।
मैं यह भी जानती हूँ कि जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होगी, जैसी मैं चाहती हूँ। आगे भी मुश्किलें आएँगी। कभी लोग समझेंगे, कभी नहीं समझेंगे। कभी मेरा मन खुश होगा, कभी उदास।
लेकिन अब मैं हर मुश्किल में खुद को अकेला और बेबस मानकर नहीं बैठना चाहती।
मैं खुद के लिए एक बेहतर जिंदगी बनाने की कोशिश करती रहूँगी।
क्योंकि मैंने बहुत वक्त दूसरों की खुशियों के लिए जिया है। अब मैं अपनी खुशियों को भी थोड़ा वक्त देना चाहती हूँ।
मेरी कहानी अभी बाकी है…
लोग कहते हैं, तुम्हारे पास परिवार है, दोस्त हैं, तुम्हारे पास सब कुछ तो है।
और मैं सोचती हूँ कि क्या किसी के पास बहुत कुछ होने का मतलब यह है कि उसे कभी अकेलापन महसूस नहीं हो सकता?
मैं अपने जीवन में मिली खुशियों के लिए ईश्वर का शुक्रिया करती हूँ। मैं अपने परिवार, दोस्तों और उन लोगों की भी कद्र करती हूँ, जिन्होंने मुझे जिंदगी में कुछ न कुछ सिखाया है।
लेकिन मेरे भीतर भी एक दुनिया है, जहाँ कुछ यादें हैं, कुछ अधूरे सपने हैं और कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें मैं हमेशा शब्दों में नहीं समझा सकती।
मैं हर वक्त उदास नहीं रहती। मैं खुश भी रहती हूँ, हँसती भी हूँ और अपने भविष्य के लिए सपने भी देखती हूँ।
बस अब मैंने यह सीख लिया है कि हर बात सबको समझाना जरूरी नहीं।
कुछ बातें सिर्फ खुद को समझानी होती हैं।
और मेरी सबसे बड़ी सीख यही है कि चाहे जिंदगी में कितने भी लोग आएँ या चले जाएँ, मुझे खुद को कभी छोड़ना नहीं है।
मैं चाहती हूँ कि एक दिन मेरी जिंदगी में इतनी रोशनी हो कि मुझे अपनी खुशियों के लिए किसी से इजाजत न माँगनी पड़े।
एक दिन मैं अपने सपनों को पूरा करूँ। अपनी पसंद की चीजें करूँ। अपने घर में दीये जलाऊँ और उन दीयों की रोशनी में अपने बीते हुए संघर्षों को याद करके मुस्कुराऊँ।
उस दिन शायद मुझे अपनी हर अधूरी ख्वाहिश का जवाब मिल जाए।
और अगर जिंदगी में कभी फिर मुश्किल वक्त आया, तो मैं खुद से बस इतना कहूँगी—
“विधि, तुमने पहले भी खुद को संभाला है। इस बार भी संभाल लोगी। तुम्हारी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।”
क्योंकि मैं सिर्फ वह लड़की नहीं हूँ, जिसने अकेलापन देखा है।
मैं वह लड़की भी हूँ, जिसने उस अकेलेपन में खुद का साथ देना सीखा है।
— विधि सैनी
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Agar Vidhi saini ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








