भीड़ में अकेलापन : एक दास्तान
शहर में रहने वाले लोगों को देखकर अक्सर लगता है कि यहाँ किसी के लिए अकेलेपन की कोई जगह नहीं होगी। सुबह से रात तक सड़कें भरी रहती हैं। बाजारों में शोर होता है, बसों में भीड़ होती है, चौराहों पर लोग एक-दूसरे से टकराते हुए निकलते हैं। हर तरफ चेहरे ही चेहरे दिखाई देते हैं।
लेकिन शायद अकेलापन चेहरे देखकर नहीं पहचाना जा सकता।
कई बार आदमी के पास बात करने के लिए पूरी दुनिया होती है, फिर भी वह अपने भीतर की एक बात कहने के लिए तरसता रहता है।
मुझे यह बात बहुत देर से समझ आई।
उस शाम मैं ऑफिस से लौटते हुए शहर के पुराने बस स्टैंड के पास बने पार्क में जा बैठा था। यह मेरी पुरानी आदत थी। घर जाने से पहले आधा घंटा उस पार्क में बैठना मुझे अच्छा लगता था। वहाँ कोई मुझे पहचानता नहीं था, इसलिए किसी से मुस्कुराने, हाल पूछने या अपने चेहरे पर खुशी दिखाने की मजबूरी भी नहीं थी।
सामने सड़क पर जिंदगी अपनी पूरी रफ्तार में भाग रही थी। बसें आ-जा रही थीं। दुकानों की बत्तियाँ जलने लगी थीं। सड़क किनारे चाय वाले के पास लोगों का छोटा-सा जमावड़ा था। कोई फोन पर बात करते हुए तेज कदमों से जा रहा था, तो कोई अपने बच्चे का हाथ पकड़े उसके पीछे-पीछे चल रहा था।
उसी भीड़ के बीच मेरी नजर एक लड़की पर जाकर ठहर गई। वह पार्क की एक बेंच पर बिल्कुल किनारे बैठी थी।
कंधे पर काला बैग था। बाल ऊपर बँधे हुए थे और हाथ में मोबाइल था। मगर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर नहीं थी। वह सामने से गुजरते लोगों को लगातार देख रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी का इंतजार कर रही हो या शायद किसी ऐसे व्यक्ति को तलाश रही हो, जिसका चेहरा उसे खुद भी ठीक से याद नहीं था।
मैंने कुछ क्षण उसे देखा और फिर नजरें हटा लीं। किसी अजनबी को घूरना मुझे अच्छा नहीं लगता था।
कुछ देर बाद मैंने देखा कि उसने मोबाइल बैग में रख दिया है। फिर बैग से एक छोटी-सी डायरी निकाली और उसमें कुछ लिखने लगी।
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मैं मन ही मन मुस्कुराया।
आजकल अगर कोई डायरी लेकर बैठ जाए तो हमें तुरंत लगता है कि वह लेखक होगा। शायद वह भी मेरी तरह अपने मन की उलझनें कागज पर उतार रही हो। तभी अचानक हवा का एक तेज झोंका आया।
डायरी उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गई और फिसलते हुए मेरे पैरों के पास आ गई।
मैंने डायरी उठाई और उसकी तरफ बढ़ गया।
ये आपकी है।
उसने सिर उठाया। हमारी नजरें पहली बार मिलीं।
उसकी आँखें खूबसूरत थीं, मगर उनमें खुशी कम और थकान ज्यादा थी। बहुत ज्यादा।
उसने डायरी लेते हुए कहा, थैंक यू।
मैने कहा, कोई बात नहीं।
मैं वापस मुड़ गया।
अभी दो कदम ही चला था कि पीछे से उसकी आवाज आई, आप रोज यहाँ आते हैं?
मैं रुककर उसकी ओर देखने लगा।
हाँ, लगभग रोज।
लड़की, क्यों?
सवाल छोटा था, मगर मैं तुरंत जवाब नहीं दे पाया।
कुछ देर सोचने के बाद कहा, शायद घर जाने से पहले थोड़ी देर अपने साथ बैठने की आदत है।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई और कहा अजीब बात है।
मैने पूछा क्या?
उसने जवाब दिया, लोग अकेले रहने से परेशान होते हैं और आप अकेले रहने के लिए यहाँ आते हैं।
मैं भी मुस्कुरा दिया। अकेले बैठना और अकेला महसूस करना एक बात नहीं है।
वह चुप हो गई। फिर बहुत धीमे से बोली, शायद।
बस हम दोनों की इतनी-सी मुलाकात थी। मैं घर लौट आया। लेकिन उस रात न जाने क्यों उसकी आँखें बार-बार याद आती रहीं।
अगली शाम मैं फिर उसी बेंच के पास था।
मैं खुद से यह मानने की कोशिश कर रहा था कि मैं रोज की तरह पार्क आया हूँ। मगर अंदर कहीं यह भी उम्मीद थी कि शायद वह लड़की आज फिर दिखाई दे।
साढ़े छह बजे के आसपास वह सचमुच आ गई।
आज उसके कपड़े नीले रंग के थे। कंधे पर वही काला बैग था और हाथ में वही डायरी।
वह सीधे मेरे पास आकर बैठ गई।
आज फिर अकेले?
मैंने मुस्कुराकर कहा, कल आप भी तो अकेली थीं।
वह मेरी तरफ देखने लगी। मैंने आज का पूछा है।
और मैंने कल का जवाब दिया, मैं हँस पड़ा।
वह भी हँस दी।
मैने फिर उनसे पूछा, आप हमेशा ऐसे ही जवाब देती हैं?
उसने कहा, जब सामने वाला बेकार सवाल पूछे तो हाँ।
अच्छा, अगली बार सोचकर सवाल करूँगा।
वो मेरी इस बात पहली बार खुलकर मुस्कुराइ।
उस छोटी-सी मुस्कान ने उसके चेहरे को बिल्कुल बदल दिया।
कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं।
फिर उसने अपना नाम बताया।
अनामिका।
मैने कहा, सुंदर नाम है।
अनामिका, और आपका नाम।
मैने कहा, जी मेरा नाम कुंदन राज दत्ता है।
वह कुछ देर चुप रही और फिर बोली, नाम सुंदर है। जिंदगी थोड़ी कम सुंदर है।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वह मुस्कुरा रही थी, जैसे उसने कोई सामान्य बात कही हो। लेकिन उस वाक्य में छिपा दर्द सामान्य नहीं था।
उसने तुरंत बात बदल दी। आप इतने गंभीर क्यों हो गए?
मैं गंभीर नहीं हूँ।
आपका चेहरा कुछ और कह रहा है।
मेरा चेहरा इतना कुछ बताता है?
बहुत कुछ।
उस शाम हम करीब आधे घंटे तक बैठे रहे। जाते समय उसने अचानक पूछा, कल आएँगे?
मैंने कहा, अगर आप आईं तो।
वह मुस्कुराकर बोली, मैं तो आऊँगी।
और वह आई, अगले दिन भी, फिर उसके बाद भी।
धीरे-धीरे हमारी रोज की मुलाकात उस बेंच पर होने लगी।
हमारी दोस्ती का कोई नाम नहीं था। न हमने उसे कोई नाम देने की कोशिश की, न जरूरत महसूस हुई।
वह जानती थी कि मुझे चाय में ज्यादा चीनी पसंद नहीं।
मैं जानता था कि उसे बारिश अच्छी लगती है।
उसे मालूम था कि ऑफिस का तनाव मुझे अक्सर चुप कर देता है। मुझे पता था कि वह रात में देर तक जागती रहती है। लेकिन एक बात हम दोनों ने जानबूझकर नहीं पूछी, हम आखिर इतने अकेले क्यों हैं?
शायद कुछ सवाल पूछने से ज्यादा महसूस करने के लिए होते हैं।
एक शाम मैंने उसकी डायरी की तरफ देखकर पूछा, इसमें क्या लिखती हो?
अनामिका तुरंत डायरी बंद कर दी और कहा कुछ खास नहीं।
कुंदन,, कुछ खास नहीं भी कोई चीज होती है?
अनामिका, होती है।
कुंदन, क्या?
अनामिका कुछ पल सोचती रही। फिर बोली, जो बात किसी इंसान से नहीं कही जा सके।
कुंदन, तो कागज से कह देती हो?
उसने मेरी तरफ देखा और कहा कागज बीच में टोका-टोकी नहीं करता।
मैं हँसा नहीं।
उसका जवाब सुनकर मेरे भीतर कुछ उतर गया था।
उस दिन मुझे लगा कि अनामिका सिर्फ अकेली नहीं थी। वह अपने अंदर बहुत सारी बातें जमा किए हुए थी।
ऐसी बातें, जिन्हें शायद वह खुद से भी पूरी तरह नहीं कह पाती थी।
एक दिन शाम को अचानक बारिश शुरू हो गई।
पार्क में बैठे लोग उठकर इधर-उधर भागने लगे।
हम दोनों अपनी जगह बैठे रहे। बारिश कुछ ही मिनटों में तेज हो गई।
अनामिका ने अपना चेहरा ऊपर कर लिया।
मैंने पूछा, बारिश इतनी पसंद है?
अनामिका, बहुत।
मैंने फिर पूछा, क्यों?
उसने कुछ देर बारिश को देखा, फिर कहा, क्योंकि बारिश में रोते हुए किसी को कोई पहचान नहीं पाता।
मैंने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
लेकिन आँखें भीग चुकी थीं। इस बार आसमान की वजह से नहीं। मैंने कोई सवाल नहीं किया। बस छतरी उसके ऊपर कर दी।
कुछ देर बाद उसने खुद कहना शुरू किया, मेरी माँ को गए तीन साल हो गए।
मैं चुपचाप सुनता रहा।
पापा उससे पहले ही चले गए थे। माँ के बाद घर बहुत बड़ा लगने लगा।
कुन्दन, भाई है?
अनामिका, हाँ।
कुंदन, फिर?
अनामिका, विदेश में रहता है।
कुंदन, बात होती है?
अनामिका, होती है।
कुंदन, फिर भी?
वह हल्के से हँसी और बोली, फोन पर परिवार होना और परिवार का पास होना अलग-अलग बातें हैं।
मैंने उस दिन पहली बार समझा कि इंसान के घर में लोग हो सकते हैं, फिर भी घर खाली हो सकता है।
एक दिन जाने क्यों मैंने उससे पूछ लिया, तुमने शादी नहीं की?
वह तुरंत मेरी तरफ देखने लगी। क्यों? तुम्हें क्यों जानना है?
कुंदन, बस यूँ ही पूछ लिया।
अनामिका, तुमने की?
कुंदन, नहीं।
अनामिका, क्यों?
मैंने कुछ देर चुप रहकर कहा, शायद ऐसी कोई मिली ही नहीं, जिसे अपने दिन की सबसे छोटी बात भी बताने का मन करे।
वह चुप हो गई। मैं भी चुप रहा।
उस दिन हमारी खामोशी में पहली बार कुछ नया था।
शायद सवाल।
शायद जवाब।
शायद ऐसा एहसास, जिसे हम दोनों अभी नाम नहीं देना चाहते थे।
एक शाम वह थोड़ी देर से आई। उसके हाथ में दो कुल्हड़ थे।
अनामिका, आज चाय मेरी तरफ से।
मैंने कुल्हड़ लेते हुए कहा, आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या?
वह हँस पड़ी। हर दिन तुम पिलाते हो। आज मेरी बारी है।
कुंदन, तो इसका मतलब दोस्ती पक्की?
अनामिका, दोस्ती का फैसला चाय से नहीं होता।
कुंदन, फिर किससे होता है?
वह कुछ देर सोचती रही। फिर जवाब दिया, जब किसी की गैरहाजिरी महसूस होने लगे, शायद तब।
मैंने उसकी तरफ देखा। वह तुरंत सामने देखने लगी।
कुछ देर बाद उसने अचानक पूछा, अगर मैं कल नहीं आई तो?
कुंदन, तो अगले दिन शिकायत करूँगा।
अनामिका, अगर कई दिन नहीं आई?
कुंदन, तुम्हारा इंतजार करूँगा।
अनामिका और अगर बहुत दिनों तक नहीं आई?
मैंने उसकी तरफ देखकर कहा, तब भी।
अनामिका ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उस दिन वह जाते समय पहले से ज्यादा उदास लग रही थी। मैं उसके उस भाव को समझ नहीं पाया। काश, उस समय समझ जाता।
अगले दिन वह नहीं आई। मैंने सोचा, शायद कोई जरूरी काम होगा। दूसरे दिन भी वह नहीं आई। तीसरे दिन भी नहीं। चौथे दिन मैं बेचैन हो गया।
अजीब बात यह थी कि मेरे पास उसे खोजने का कोई तरीका नहीं था। मुझे उसका घर नहीं मालूम था। उसका मोबाइल नंबर भी नहीं था।
हमने कभी सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को खोजने की जरूरत महसूस नहीं की थी।
जिस लड़की से मैं रोज मिलता था, उसके बारे में मेरे पास उसे ढूँढ़ने के लिए कुछ भी नहीं था।
तभी मुझे समझ आया कि कुछ रिश्ते कितने नाजुक होते हैं। वे हर दिन हमारे सामने होते हैं, लेकिन उनके टूट जाने की खबर हमें तब मिलती है जब सामने वाली जगह अचानक खाली रह जाती है।
पाँचवें दिन वह आई। मगर आज उसका चेहरा बदला हुआ था। वह मेरे पास बैठी और बिना कुछ कहे अपनी डायरी मेरी ओर बढ़ा दी।
अनामिका, इसे पढ़ो।
मैंने पूछा, क्या हुआ?
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने डायरी खोल ली।
पहले पन्ने पर लिखा था
कुछ लोग जिंदगी में इसलिए आते हैं, ताकि हमें यह याद दिला सकें कि हम अभी पूरी तरह अकेले नहीं हुए हैं।
मैं अगला पन्ना पलटता गया। उसमें उसकी माँ की यादें थीं। बचपन की बातें थीं। पिता के घर से चले जाने का जिक्र था। भाई के विदेश जाने की बात थी। और फिर एक जगह मेरी नजर ठहर गई।
वहाँ मेरा जिक्र था। उसने लिखा था
आज एक अजनबी मिला। उसने मेरी डायरी उठाकर दी। पता नहीं क्यों, उसकी आवाज में अपनापन लगा।
मैंने आगे पढ़ा।
बहुत दिनों बाद ऐसा लगा कि किसी के पास बैठकर चुप रहना भी बातचीत हो सकता है।
मेरी आँखें नम हो गईं।
मैंने डायरी बंद कर दी। मुझे यह सब क्यों दिखा रही हो?
वह कुछ देर तक चुप रही।
isse bhi padhein : जिंदगी का सबसे मुश्किल फैसला
फिर बोली, क्योंकि कल मैं जा रही हूँ।
कुंदन, कहाँ?
अनामिका, दिल्ली।
कुंदन, क्यों?
अनामिका, नौकरी मिल गई है।
मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था।
उसने मेरी तरफ देखा। तुम खुश नहीं हुए?
कुंदन, खुश हुआ।
अनामिका, फिर ऐसे क्यों देख रहे हो?
मैंने धीमे से कहा, कुछ लोग आदत बन जाते हैं।
वह हल्का-सा मुस्कुराई और कहा आदतें छूट जाती हैं।
यादें? वे कहाँ जाती हैं?
अगली शाम वह नहीं आई।
मैं काफी देर तक उसी बेंच पर बैठा रहा।
आसपास वही सब था। लोगों की आवाजें। बसों का शोर।
चाय की दुकान। सड़क की रोशनी। भागते हुए कदम।
लेकिन उस दिन मुझे पहली बार लगा कि भीड़ कितनी खाली हो सकती है। मैं जिस चेहरे की प्रतीक्षा कर रहा था, वह वहाँ नहीं था।
उस रात घर जाकर मैंने पहली बार अपने लिए एक डायरी खरीदी।
शायद अनामिका की वजह से।
पहले पन्ने पर लिखा
आज वह चली गई। शहर वही है, मगर आज इसकी भीड़ कुछ ज्यादा शोर कर रही है।
मैंने बहुत देर तक पेन हाथ में पकड़े रखा।
आगे कुछ नहीं लिख पाया।
कुछ भाव ऐसे होते हैं जिन्हें लिखने की कोशिश करते ही वे छोटे लगने लगते हैं। मैंने डायरी बंद कर दी।
छह महीने बीत गए।
जिंदगी धीरे-धीरे फिर अपनी पुरानी पटरी पर आ गई।
ऑफिस, घर, काम, छुट्टियाँ, दोस्तों के साथ कभी-कभार चाय और बाकी समय अपने कमरे की खामोशी।
मैंने उस पार्क में जाना भी कम कर दिया था।
फिर एक शाम अचानक मन हुआ कि बहुत दिनों बाद वहाँ जाऊँ।
मैं उसी रास्ते से होकर पार्क पहुँचा। पुरानी बेंच सामने थी।
लेकिन उस पर कोई पहले से बैठा था। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। काले रंग का बैग। ऊपर बँधे हुए बाल।
मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
दिल ने कहा, ऐसा नहीं हो सकता। दिमाग ने भी यही कहा। फिर भी कदम अपने आप आगे बढ़ते गए।
वह मुड़ी। अनामिका थी। छह महीने बाद।
कुछ पल तक हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा, बहुत देर कर दी।
मैंने हँसने की कोशिश की। तुम मेरा इंतजार कर रही थीं?
अनामिका, नहीं।
कुंदन, फिर?
उसने बेंच पर जगह बनाते हुए कहा, खुद का इंतजार कर रही थी।
मैं उसके पास बैठ गया। दिल्ली कैसी रही?
वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली, सब कुछ था वहाँ।
कुंदन, मतलब?
अनामिका, अच्छी नौकरी थी। पैसे थे। बड़ा ऑफिस था। सुंदर कमरा था। हर समय आसपास लोग रहते थे।
कुंदन, फिर?
अनामिका, फिर भी रात को कमरे का दरवाजा बंद करते ही वही खालीपन सामने खड़ा हो जाता था।
मैं चुपचाप सुनता रहा।
एक रात माँ की डायरी पढ़ रही थी।
कुन्दन, तुम्हारी माँ की?
अनामिका, हाँ।
कुंदन, क्या लिखा था?
वह मुस्कुराई। उन्होंने लिखा था, इंसान को भीड़ नहीं चाहिए। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए जिसके पास बैठकर वह खुद को अकेला महसूस न करे।’
मैं कुछ नहीं बोला।
वह आगे कहती रही, तब समझ आया कि मैं सिर्फ शहर बदल रही थी। अपनी जिंदगी में कुछ नहीं बदल रही थी।
कुंदन, इसलिए वापस आ गई?
अनामिका, हाँ।
कुंदन, हमेशा के लिए?
उसने मेरी तरफ देखा। पता नहीं।
मैंने मुस्कुराकर कहा, बस इस बार बिना बताए मत जाना।
वह भी मुस्कुराई और इस बार नहीं जाऊँगी।
उस दिन उसने दिल्ली की बहुत-सी बातें सुनाईं। नई नौकरी में मिले लोग। मेट्रो में सफर। छोटा-सा किराए का कमरा। ऑफिस से लौटकर अकेले खाना बनाना।
त्योहार के दिन खिड़की से बाहर देखते रहना और वे रातें जब वह सो नहीं पाती थी और नीचे सड़क से गुजरती गाड़ियों की आवाज सुनती रहती थी।
फिर अचानक उसने कहा, वहाँ एक बात समझ आई।
कुंदन, क्या?
अनामिका, बहुत बड़े शहर में आदमी बहुत आसानी से खो जाता है।
मैंने पूछा, यहाँ नहीं?
अनामिका, यहाँ भी।
कुंदन, फिर फर्क?
वह मेरी तरफ देखकर बोली, यहाँ मेरी गैरहाजिरी किसी को महसूस होती है।
मैं कुछ कह नहीं पाया।
उस एक वाक्य ने जैसे छह महीनों की दूरी को मिटा दिया।
हमने उन महीनों का हिसाब नहीं माँगा।
कहाँ थीं, किससे मिलीं, कितनी बार मुझे याद किया, इन सवालों की जरूरत नहीं थी।
कुछ रिश्तों में हर बात का जवाब माँगना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी सामने वाले का वापस आ जाना ही सबसे बड़ा जवाब होता है।
जाते समय उसने अपनी डायरी मेरी तरफ बढ़ा दी।
इसे रख लो।
मैंने पूछा, क्यों?
इसमें तुम्हारी कहानी अभी अधूरी है।
मैंने डायरी वापस उसकी तरफ कर दी और कहा तुम ही लिखो।
वह मुस्कुराई। नहीं। अब साथ में लिखेंगे।
मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया। उसने मेरा हाथ थाम लिया। उस छोटे-से स्पर्श में छह महीने की दूरी, बहुत-सी अनकही बातें और एक अनिश्चित-सी उम्मीद सब शामिल थीं।
उस शाम मुझे आखिरकार समझ आया कि अकेलापन हमेशा इस बात का नाम नहीं कि हमारे आसपास कोई नहीं है।
isse bhi padhein : वह अधूरी मुलाकात और खामोशियाँ
कभी-कभी आदमी के आसपास परिवार होता है, दोस्त होते हैं, सहकर्मी होते हैं, सोशल मीडिया पर सैकड़ों लोग होते हैं, फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट भरी होती है, फिर भी उसके भीतर एक कमरा ऐसा रह जाता है, जहाँ वह किसी को आने नहीं देता। और कभी-कभी जिंदगी अचानक किसी ऐसे इंसान को उस कमरे के दरवाजे तक ले आती है, जिसके सामने दरवाजा बंद रखने का मन ही नहीं करता। अनामिका ने मेरी चुप्पी पढ़ी थी। मैंने उसकी आँखों का अकेलापन।
शायद इसी को अपनापन कहते हैं। हम पार्क से बाहर निकलने लगे।
कुछ कदम चलने के बाद उसने पूछा, चाय?
मैंने मुस्कुराकर कहा, कम चीनी वाली?
वह हँस पड़ी।
तुम्हें अभी तक याद है?
मैंने कहा, कुछ बातें भूलने के लिए नहीं होतीं। वह मेरे साथ चलने लगी। पीछे वही पुरानी बेंच रह गई।
कुछ देर बाद शायद कोई और वहाँ आकर बैठ गया होगा।
शायद वह भी किसी का इंतजार कर रहा होगा।
शायद वह भी अपनी जिंदगी में किसी ऐसे इंसान की तलाश में होगा जिसके सामने उसे अपने दुख को समझाने की जरूरत न पड़े। शहर की भीड़ वैसे ही चलती रही। लोग आते रहे। लोग जाते रहे। सड़कें शोर करती रहीं। दुकानों की रोशनी जलती-बुझती रही। लेकिन उस शाम मुझे उस भीड़ से शिकायत नहीं थी।
क्योंकि अब मैं जान चुका था, अकेलेपन को खत्म करने के लिए हमेशा बहुत सारे लोगों की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी हजार चेहरों के बीच सिर्फ एक चेहरा अपना लगने लगे, तो पूरा शहर थोड़ा कम अजनबी हो जाता है।
और शायद जिंदगी की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है।
हम कभी नहीं जानते कि कौन-सा अजनबी कब हमारी कहानी का सबसे जरूरी किरदार बन जाएगा।
उस दिन तक वह मेरे लिए पार्क की एक अनजान लड़की थी। फिर एक दोस्त बनी। फिर मेरी आदत। और शायद अब, मेरी कहानी का वह हिस्सा, जिसे मैं अधूरा छोड़ना नहीं चाहता था।
हम दोनों आगे बढ़ते रहे। पीछे भीड़ थी। आगे सड़क थी।
और बीच में दो लोग थे, जिन्हें आखिरकार यह यकीन हो गया था कि दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, इंसान को सुकून देने के लिए कभी-कभी बस एक सच्चे साथ की जरूरत होती है।
क्योंकि भीड़ में अकेला होना शायद जिंदगी की आखिरी सच्चाई नहीं है। कभी-कभी उसी भीड़ में कोई ऐसा मिल जाता है, जिसके साथ चलते हुए पहली बार महसूस होता है।
मैं अकेला नहीं हूँ।
समाप्त।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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Agar कुंदन राज दत्ता "निश्छल" ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








