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माँ की पुरानी संदूक के राज़

Vidhi saini • Superstar Writer • Sahitya Ratna

माँ की पुरानी संदूक के राज़

कुछ संदूक लकड़ी के होते हैं, और कुछ में एक माँ अपनी पूरी दुनिया सँजोकर रखती है।

आज के समय में संदूक जैसे धीरे-धीरे हमारे घरों से गायब होते जा रहे हैं। एक समय था, जब लगभग हर घर में एक संदूक हुआ करती थी। किसी के घर में लोहे की, तो किसी के घर में लकड़ी की। उसमें कपड़े, बर्तन, गहने और घर की न जाने कितनी ज़रूरत की चीज़ें सँभालकर रखी जाती थीं। लेकिन आज उन संदूकों की जगह बॉक्स बेड और अलमारियों ने ले ली है। नए घरों में संदूक को अक्सर जगह घेरने वाला सामान समझा जाता है।

मगर पुराने घरों में आज भी कहीं न कहीं कोई संदूक ज़रूर मिल जाएगी, जिसके भीतर सिर्फ सामान नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की यादें बंद होती हैं।

मेरे लिए भी मेरी माँ की पुरानी संदूक कुछ ऐसी ही है।

जब भी मैं उस संदूक को खोलती हूँ, मेरे चेहरे पर अपने आप एक मुस्कान आ जाती है। उसमें रखी पुरानी चीज़ों को निकालकर देखना मुझे हमेशा से पसंद रहा है। हर चीज़ को हाथ में लेते हुए ऐसा लगता है, जैसे मैं बीते हुए समय को छू रही हूँ।

कभी माँ की शादी की साड़ी देखकर खुश हो जाती हूँ, तो कभी उन पीतल के बर्तनों को देखकर, जिन्हें माँ ने इतने सालों से सँभालकर रखा है। उन बर्तनों में एक अलग ही चमक है—सिर्फ पीतल की नहीं, बल्कि उन दिनों की भी, जब रिश्तों और चीज़ों को बहुत प्यार से सँभालकर रखा जाता था।

माँ की संदूक खोलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि इसके भीतर न जाने कितनी कहानियाँ छिपी हुई हैं। कुछ कहानियाँ माँ की हैं, कुछ नानी की और कुछ उन दिनों की, जिन्हें मैंने कभी जिया ही नहीं, मगर उनकी निशानियाँ आज भी मेरे घर में मौजूद हैं।

दादी की संदूक और बीते ज़माने का हुनर

मेरी दादी की भी एक संदूक हुआ करती थी। उस संदूक से मुझे पीतल के बड़े-बड़े गिलास, कटोरे और पीतल-काँसे के पुराने बर्तन मिले। उनमें से कुछ चीज़ें इतनी सुंदर थीं कि उन्हें देखकर मन करता था कि बस देखती ही रहूँ।

लेकिन दादी की संदूक में सिर्फ बर्तन ही नहीं थे। उसमें उनकी मेहनत, उनका हुनर और उनके हाथों का जादू भी छिपा था।

दादी अपने हाथों से दरियाँ बनाती थीं। ऊन से स्वेटर बुनती थीं और ऐसी कई चीज़ें तैयार करती थीं, जिन्हें आज हम बाज़ार से खरीदकर ले आते हैं। जिन चीज़ों को बनाने के लिए आज हम दुकानों के चक्कर लगाते हैं, दादी उन्हें अपने हाथों से बना लिया करती थीं।

जब मैं उनकी बनाई हुई चीज़ों को देखती हूँ, तो मन में एक कसक-सी उठती है।

काश, दादी आज हमारे बीच होतीं!

मैं उनसे कितना कुछ सीख सकती थी। उनसे स्वेटर बुनना सीखती, दरियाँ बनाना सीखती और उनके साथ बैठकर घंटों बातें करती। उनकी उँगलियों में जो हुनर था, शायद उसका थोड़ा-सा हिस्सा मैं भी अपने भीतर उतार पाती।

हमारे घर में एक पुराना चरखा भी हुआ करता था। समय के साथ वह इतना पुराना हो गया कि टूट गया। आज जब उसके बारे में सोचती हूँ, तो लगता है कि उसके साथ सिर्फ लकड़ी का एक सामान नहीं टूटा, बल्कि हमारी पुरानी पीढ़ी के हुनर से जुड़ी एक निशानी भी खो गई।

दादी अब नहीं हैं, लेकिन उनकी बनाई हुई चीज़ें आज भी मुझे उनकी याद दिलाती हैं। शायद इसी का नाम विरासत है—इंसान चला जाता है, मगर उसके हाथों का स्पर्श उसकी चीज़ों में कहीं न कहीं रह जाता है।

माँ की संदूक में छिपी एक और दुनिया

जब मैं माँ की संदूक खोलती हूँ, तो उसमें मुझे ऐसी कई चीज़ें मिलती हैं, जिन्हें देखकर अक्सर मेरे मुँह से निकल जाता है, “माँ, ये सब कितना सुंदर है! इसे बाहर निकालकर क्यों नहीं रखतीं? हम इन चीज़ों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?”

कभी उसमें डिज़ाइनर डिनर सेट मिलता है, तो कभी सुंदर पेंटिंग। कभी पुराने ज़माने के बर्तन, तो कभी ऐसी साड़ियाँ, जिन्हें देखकर लगता है कि आज भी पहन ली जाएँ तो कितनी खूबसूरत लगेंगी।

मैं अक्सर माँ से कहती हूँ, “माँ, ये सब चीज़ें बाहर निकाल लो न! घर में रखेंगे, इस्तेमाल करेंगे। इतनी सुंदर चीज़ें संदूक में बंद करके रखने का क्या फायदा?”

माँ मेरी बात सुनकर मुस्कुरा देती हैं। वह एक-एक करके मुझे सामान दिखाती हैं और फिर बड़े प्यार से वापस उसी संदूक में रख देती हैं।

पहले मुझे समझ नहीं आता था कि माँ ऐसा क्यों करती हैं। जब चीज़ें इतनी सुंदर हैं, तो उन्हें इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? उन्हें यूँ ही बंद करके क्यों रखा जाता है?

लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि माँ के लिए वह सामान सिर्फ सामान नहीं है।

उस संदूक में उनकी अपनी ज़िंदगी के कई हिस्से बंद हैं। कुछ चीज़ें उन्हें उनकी माँ ने दी थीं, कुछ शादी के समय मिली थीं और कुछ उन्होंने सालों तक थोड़ी-थोड़ी करके जमा की थीं।

लेकिन इन सबके पीछे एक और वजह है, जो शायद मैंने पहले कभी ठीक से समझी ही नहीं थी।

माँ यह सब अपनी बेटी के लिए सँभालकर रख रही थीं।

एक माँ अपनी बेटी के लिए कब से जोड़ने लगती है?

कहते हैं कि एक पिता अपनी बेटी की ज़रूरतों के लिए मेहनत करता है, लेकिन एक माँ भी अपनी बेटी के लिए न जाने कितने सपने अपने भीतर सँजोकर रखती है।

कई बार बेटी के जन्म के साथ ही माँ उसके भविष्य के लिए चीज़ें जोड़ना शुरू कर देती है। कोई सुंदर साड़ी मिल जाए, तो सोचती है—इसे बेटी की शादी के लिए रख देती हूँ। कहीं से अच्छे बर्तन मिल जाएँ, तो उन्हें भी संदूक में रख देती है। कोई गहना मिले, तो मन में ख्याल आता है कि जब बेटी बड़ी होगी, तब उसे दे दूँगी।

माँ को अपने लिए कोई महँगी साड़ी मिलती है, तो वह उसे भी पहनने के बजाय सँभालकर रख देती है। नानी उन्हें कुछ देती हैं, तो कई बार माँ कह देती हैं, “मेरे लिए मत रखो, मेरी बेटी के लिए रख देना।”

उस समय शायद बेटी को इन बातों का अर्थ समझ नहीं आता। उसे लगता है कि माँ के पास कितनी सारी चीज़ें हैं और वह उनका इस्तेमाल भी नहीं करतीं। लेकिन माँ के मन में उन चीज़ों के साथ एक सपना जुड़ा होता है।

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वह सपना अपनी बेटी को सजते-सँवरते देखने का, उसे अपने घर से विदा करते समय उसके हाथों में कुछ देने का और उसे नए जीवन की शुरुआत के लिए अपनी तरफ़ से कुछ सौंपने का होता है।

समाज उस सामान को दहेज का नाम देता है। लेकिन माँ की भावनाओं को सिर्फ एक शब्द में समेट देना शायद आसान नहीं है।

उसके लिए वह कभी अपनी माँ की निशानी होती है, कभी बरसों की बचत और कभी अपनी बेटी के लिए सँजोया हुआ प्यार।

हालाँकि बेटी को प्यार और सम्मान के साथ विदा करने के लिए सामान होना ज़रूरी नहीं है, फिर भी कई माँएँ अपनी परंपराओं और भावनाओं के चलते यह सब जोड़ती रहती हैं। उनके लिए उन चीज़ों का मूल्य अक्सर उनकी कीमत से कहीं ज़्यादा होता है।

वे हर छोटी-बड़ी चीज़ के साथ एक उम्मीद रखती हैं कि जब उनकी बेटी अपने नए घर जाएगी, तो उसे अपनी माँ की दी हुई कोई चीज़ देखकर मायके की याद आएगी।

संदूक में बंद माँ के अपने सपने

कभी-कभी सोचती हूँ कि माँ ने अपनी ज़िंदगी में कितनी चीज़ें सिर्फ इसलिए नहीं खरीदी होंगी कि उन्हें अपनी बेटी के लिए कुछ बचाकर रखना था।

कितनी साड़ियाँ होंगी, जिन्हें पहनने का मन तो किया होगा, लेकिन यह सोचकर नहीं पहना होगा कि बेटी की शादी में काम आएँगी।

कितने बर्तन होंगे, जिन्हें देखकर उन्हें खुद भी पसंद आया होगा, लेकिन उन्होंने उन्हें अपने इस्तेमाल के लिए निकालने के बजाय संदूक में रख दिया होगा।

कितनी छोटी-छोटी इच्छाएँ होंगी, जिन्हें उन्होंने यह सोचकर टाल दिया होगा कि अभी नहीं, बाद में। अभी मेरी बेटी के लिए कुछ जोड़ना है।

और यह सब करते हुए उन्होंने कभी हिसाब नहीं लगाया होगा कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए कितना खर्च किया, कितनी चीज़ें जमा कीं या कितने साल लगाए।

माँ का प्यार शायद ऐसा ही होता है। वह अपनी खुशी में भी अपने बच्चों की खुशी तलाश लेती है।

लेकिन इस सोच के साथ एक सवाल भी मन में आता है—क्या माँ को अपनी पसंद की साड़ी पहनने का, अपने पसंदीदा बर्तन इस्तेमाल करने का और अपने लिए कुछ बचाकर रखने का उतना ही हक़ नहीं है?

बिल्कुल है।

माँ का प्यार उसकी अपनी इच्छाओं को मिटा देने में नहीं, बल्कि अपने बच्चों के साथ अपनी खुशियाँ बाँटने में भी है। और शायद आज की बेटियों के लिए सबसे खूबसूरत बात यही होगी कि वे अपनी माँ की सँभालकर रखी चीज़ों को प्यार से अपनाएँ, मगर अपनी माँ को भी उन खुशियों का हिस्सा बनाएँ जिन्हें वह बरसों से सिर्फ बेटी के नाम करती आई है।

जब संदूक खुलेगी, तो सिर्फ सामान नहीं निकलेगा

अब जब भी मैं माँ की संदूक खोलती हूँ, तो उसे पहले की तरह सिर्फ पुराने सामान का डिब्बा नहीं समझती।

मुझे उसमें माँ की शादी के दिन दिखाई देते हैं। नानी का प्यार दिखाई देता है। दादी के हाथों का हुनर दिखाई देता है। पुराने समय की वह दुनिया दिखाई देती है, जहाँ चीज़ें जल्दी फेंकी नहीं जाती थीं, बल्कि सालों तक सँभालकर रखी जाती थीं।

मुझे वह बेटी भी दिखाई देती है, जो अभी छोटी थी और जिसे शायद यह समझ नहीं था कि माँ उसके लिए क्या-क्या जोड़ रही है।

और मुझे वह माँ भी दिखाई देती है, जो अपनी बेटी को बड़े होते हुए देख रही थी और चुपचाप उसके भविष्य के लिए सपने जमा कर रही थी।

शायद एक दिन मेरी माँ की संदूक भी खुलेगी। उसमें रखी साड़ियाँ निकाली जाएँगी, पीतल के बर्तन फिर से चमकेंगे, डिनर सेट इस्तेमाल होगा और वे चीज़ें, जो सालों से बंद पड़ी हैं, किसी नए घर में अपनी जगह बनाएँगी।

हो सकता है, उनमें से कुछ चीज़ें मेरी अगली पीढ़ी तक भी पहुँचें। तब मैं उन्हें दिखाकर कहूँगी कि ये सिर्फ पुराने बर्तन या कपड़े नहीं हैं। ये तुम्हारी नानी की निशानियाँ हैं। ये उस समय की यादें हैं, जब उन्होंने अपनी बेटी के लिए इन्हें बहुत प्यार से सँभालकर रखा था।

और शायद तब उन्हें भी समझ आएगा कि एक संदूक में कितनी सारी ज़िंदगियाँ समाई हो सकती हैं।

क्योंकि संदूक की असली कीमत उसकी लकड़ी, लोहे या उसमें रखे महँगे सामान में नहीं होती।

उसकी असली कीमत उन हाथों में होती है, जिन्होंने उसे भरा था। उन सपनों में होती है, जिन्हें उसके भीतर रखा गया था। और उस प्यार में होती है, जो बिना कुछ कहे सालों तक उसके बंद ढक्कन के पीछे पलता रहता है।

माँ की पुरानी संदूक में सिर्फ सामान नहीं होता। उसमें एक माँ का बीता हुआ कल, उसकी बेटी का आने वाला कल और उन दोनों के बीच का अनकहा प्यार बंद होता है।

और सच कहूँ, तो जब भी मैं माँ की संदूक खोलती हूँ, मुझे लगता है कि मैं कोई पुराना सामान नहीं देख रही हूँ।

मैं अपनी माँ का प्यार देख रही हूँ।

वह प्यार, जिसे उन्होंने कभी शब्दों में नहीं कहा, लेकिन अपनी पूरी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी खुशियाँ जोड़कर मेरे लिए सँभालकर रख दिया।

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