सपनों की कीमत: एक लड़की का संघर्ष, आत्मनिर्भरता
कभी-कभी जिंदगी का सफर अचानक इतना कठिन हो जाता है कि इंसान पीछे मुड़कर देखता है और सोचता है—क्या मेरा सफर सच में इतना मुश्किल हो जाएगा, मैंने कभी सोचा भी नहीं था।
बचपन से लेकर स्कूल और कॉलेज तक मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरे पास पैसों की कमी है। पापा हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। पढ़ाई से जुड़ी जरूरतों के लिए उन्होंने कभी मुझे परेशान नहीं होने दिया। शायद इसी वजह से मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे अपनी पढ़ाई और अपने सपनों के खर्च के लिए खुद संघर्ष करना पड़ेगा।
मैंने नौवीं कक्षा से ही अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर होना शुरू कर दिया था। मुझे लगता था कि अगर मैं मन लगाकर पढ़ूं और अपनी मेहनत पर भरोसा रखूं तो किसी बड़े या महंगे स्कूल के बिना भी अच्छा कर सकती हूं। मेरा ध्यान हमेशा पढ़ाई पर रहा। मैं चाहती थी कि मेरे पापा पर मेरी वजह से ज्यादा आर्थिक बोझ न पड़े।
गांव से बाहर जाकर पढ़ना आसान नहीं था। कई बार सिर्फ बाहर जाने की बात पर ही घर में बहुत कुछ सुनना पड़ता था। मेरे पास उस समय कोई ऐसा शिक्षक या मार्गदर्शक भी नहीं था जो हर कदम पर मेरा साथ देता। फिर भी मैंने अकेले पढ़ना सीखा, खुद फैसले लेना सीखा और धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई।
इसे भी पढ़े : वाणी की कहानी: कॉलेज का पहला दिन और एक दर्दनाक अनसुलझा राज
जब परिणाम अच्छा आया तो मुझे आगे की पढ़ाई और ट्यूशन को लेकर भी उम्मीद मिली। मेरे छोटे भाई अच्छे स्कूलों में पढ़े। उनके लिए भी मैंने हमेशा यही चाहा कि उन्हें वह शिक्षा मिले, जो उनके भविष्य के लिए बेहतर हो।
कॉलेज के दिनों में भी पापा ने मेरी पढ़ाई के खर्च में कमी नहीं आने दी। मेरी किताबें, कोचिंग फीस और दूसरी जरूरतें पूरी होती रहीं। मैंने कभी फैशन या महंगी चीजों को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया। कभी-कभी मन करता था कि मैं भी अपने लिए कुछ करूं, लेकिन अंदर से एक डर रहता था कि अगर मैंने इन चीजों पर पैसा खर्च किया तो कहीं मेरी पढ़ाई पीछे न छूट जाए।
क्योंकि मेरे लिए मेरा करियर और मेरी आजादी हमेशा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहे।
मैंने अपनी जिंदगी में जो भी संघर्ष किया, वह सिर्फ अपने लिए नहीं था। मैं अपनी पहचान बनाना चाहती थी। मैं चाहती थी कि एक लड़की होने के बावजूद मेरे फैसलों की अपनी कीमत हो। मैं अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकूं और अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियां बदल गईं।
पिछले लगभग तीन वर्षों से मैं अपनी तैयारी और करियर के लिए लगातार संघर्ष कर रही हूं। अब मेरी पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्च का बड़ा हिस्सा मुझे खुद उठाना पड़ता है। कभी मैं ट्यूशन पढ़ाती थी और महीने में लगभग 1000 से 1200 रुपये कमा लेती थी। उसी में छोटे-मोटे खर्च पूरे हो जाते थे। मैंने कम पैसों में रहना सीख लिया था, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां ऐसी होती गईं कि वह कमाई भी पर्याप्त नहीं रही।
सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब कोई आपकी मेहनत की कमाई रोक ले।
यह भी पढ़े- प्यार में विश्वासघात
मेरे कुछ पैसे आज भी अलग-अलग जगहों पर अटके हुए हैं। जिन लोगों को जरूरत के समय पैसे दिए, उन्होंने वापस नहीं किए। कभी किसी ने मेरी मेहनत की पूरी कीमत नहीं दी तो कभी भुगतान टलता रहा। बार-बार ऐसा होने पर इंसान के मन में एक सवाल जरूर आता है—आखिर मेरी मेहनत की कमाई को कोई इतनी आसानी से कैसे रोक सकता है?
फिर भी मैं शिकायत करते हुए बैठ नहीं गई।
मैंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी। SSC की तैयारी के दौरान कई बार कोचिंग फीस भी खुद संभाली। कभी परिवार से मदद मिली तो उसके साथ भी कई तरह की बातें सुननी पड़ीं। एक समय ऐसा आया जब मैंने आर्थिक मदद लेना ही बंद कर दिया, क्योंकि मदद के साथ अगर किसी को बार-बार यह एहसास दिलाया जाए कि वह तुम पर खर्च कर रहा है, तो वह मदद भी बोझ जैसी लगने लगती है।
मैंने ट्यूशन भी छोड़ दिया। सच कहूं तो मैं उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। पढ़ाना मुझे पसंद था और उससे मिलने वाली छोटी-सी आमदनी मेरी पढ़ाई में बहुत काम आती थी। लेकिन लगातार परिस्थितियों और मानसिक दबाव ने एक समय ऐसा कर दिया कि मेरा मन ही हट गया।
सबसे कठिन पल तब आया जब मुझे अपनी परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए भी पैसे उधार लेने पड़े।
मैंने जिंदगी में पहली बार दोस्तों से इस तरह पैसे मांगे थे। बहुत बुरा लगा। जिन लोगों को मैं अपना समझती थी, उनसे मदद मांगना मेरे लिए आसान नहीं था। कुछ दोस्तों से पैसे नहीं मिल पाए। दूसरी तरफ जहां काम किया था, वहां की पेमेंट भी समय पर नहीं मिली।
ऐसा लगने लगा जैसे मैं चारों तरफ से मजबूर हूं।
इसे भी पढ़े : कटते जंगल cutting down forests
लेकिन शायद इंसान की असली ताकत वहीं सामने आती है, जहां उसके पास हार मानने के सारे कारण मौजूद हों।
आज मेरे पास बहुत ज्यादा पैसे नहीं हैं। मेरे पास हर सुविधा नहीं है। कभी नोट्स की PDF नहीं निकलती तो मैं हाथ से नोट्स लिख लूंगी। इसमें दोगुना समय लगेगा, लेकिन मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूंगी। आगे की पढ़ाई का खर्च कैसे पूरा होगा, यह भी शायद धीरे-धीरे पता चल जाएगा।
लेकिन पीछे हटना मेरे लिए विकल्प नहीं है।
क्योंकि अगर मैं अपने सपने से पीछे हट गई, तो हार सिर्फ मेरी होगी। दुनिया कुछ समय बाद भूल जाएगी कि मैंने किन परिस्थितियों में कोशिश की थी। किसी को फर्क नहीं पड़ेगा कि मैंने कितनी रातें जागकर पढ़ाई की, कितनी बार पैसों की चिंता के बीच किताब खोली या कितनी बार अपनी मेहनत की कमाई के लिए किसी से अपना हक मांगा।
इसलिए मैंने तय किया है कि मैं आगे बढ़ती रहूंगी।
मेरा सवाल सिर्फ अपने लिए नहीं है।
क्या लड़कियों के सपने नहीं होते?
क्या लड़कियों को सिर्फ इसलिए छोटे सपने देखने चाहिए क्योंकि उनके पास आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है? क्या किसी लड़की की जिंदगी की कीमत सिर्फ शादी से तय होनी चाहिए? क्या उसे अपने करियर, अपनी शिक्षा और अपनी आजादी के लिए संघर्ष करने का अधिकार नहीं है?
सपने देखने की कोई औकात नहीं होती।
सपने वही देखने चाहिए जो आपके दिल में हैं और फिर उन्हें पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, आर्थिक समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, रास्ते में लोग चाहे जितनी बार निराश करें—अपनी मेहनत पर विश्वास करना बंद नहीं करना चाहिए।
मैं आज भी संघर्ष कर रही हूं।
लेकिन मैं कमजोर नहीं हूं।
मेरे पास शायद संसाधन कम हैं, लेकिन हौसला कम नहीं है। मेरे पास शायद हर सुविधा नहीं है, लेकिन सीखने और आगे बढ़ने की इच्छा आज भी उतनी ही मजबूत है।
मैंने अकेले चलना सीखा है और जरूरत पड़ी तो अकेले ही आगे भी चलूंगी।
क्योंकि मेरा सपना सिर्फ एक नौकरी पाना नहीं है।
मेरा सपना आत्मनिर्भर बनना है। अपने फैसले खुद लेना है। अपनी मेहनत की कीमत खुद तय करना है और एक ऐसी जिंदगी जीना है, जहां मुझे अपने सपनों के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।
शायद मेरा सफर कठिन है।
लेकिन मैं इस सफर को अधूरा छोड़ने वाली नहीं हूं।
— विधि सैनी
स्वरचित एवं मौलिक रचना







