चीखते कटते जंगल

कविता- चीखते कटते जंगल

सुनो चीख उस जंगल की, जो धीरे-धीरे ढल रहे हैं,

कुल्हाड़ी की हर चोट पर, ये दिल का टुकड़ा जलता हैI

गिरते पेड़ों की आहट है, जैसे धरती रोती है,

जो काट रहे हैं आज इन्हें, कल अपनी करनी पर रोयेंगे I

उड़ चले पंछी सभी, छूटा उनका घर- बार,

बाघ- हाथी, घबराए, टूटा उनका घर संसार l

सूखी डालियाँ फैली है, जहाँ घनी छांव होती थी,

रेत बिखरी पड़ी, जहाँ हरियाली भरी थी I

बादल आते- आते रुकते, पानी बिन बरसे,

तपती धरती पूछ रहीं, क्यों मेरी गोद रोए?

मिट्टी बह जाती है अब, हर बारिश के मौसम में, बंजर होते खेत हैं, काँपता हर इंसानी जिस्म l

लकड़ी को ना अपनाओ काग़ज़ को ना करो इस्तेमाल,

हर कटे पेड़ के बदले, और अधिक पेड़ लगाओ I

जंगल बचेंगे तभी बचेगी बच्चों की ये दुनिया,

हरे भरे पेड़ ही एकमात्र, हम सब की संजीवनी है I

रुको, जागो, सम्भल जाओ, अभी भी मोका है,

पेड़ों का साया पाओ, भविष्य का मोल मत गंवाon l

कटते जंगल चीखते हैं, सुनो उनकी पुकार,

“हरा- भरा ये आसमान, है हमारा ही आधार !”

सुनीता पुष्कर

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