वाणी की कहानी में हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता है। कॉलेज का पहला दिन खत्म होने के बाद वाणी और पूर्वी दोनों घर लौट चुकी थीं।
वाणी सीधे अपने कमरे में चली गई। कुछ देर बाद फ्रेश होकर जब वह नीचे आई, तो मम्मी ने दुलार से पूछा, “आज का दिन कैसा गया बेटा? पहला दिन था, कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
वाणी वैसे तो कम ही बोलती है, लेकिन अपनी मम्मी से सब कुछ शेयर करती है। उसने उदास मन से बताया कि कैसे वीर ने सब के सामने उसका मजाक बनाया। मम्मी ने उसे प्यार से समझाया, “बेटा, ऐसे लोगों से तुम्हें समझदारी से काम लेना पड़ेगा। थोड़ा खुलकर बात करो और दोस्ती करने की कोशिश करो।” वाणी ने सहमति में सिर हिलाया और मम्मी से लिपट गई।
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वाणी की कहानी और रात का खौफनाक डर
वाणी की उम्र भले ही बढ़ रही थी, लेकिन वह आज भी बच्चों की तरह अपनी दादी के साथ ही सोती है। असल में, वह अक्सर रात को अचानक डरकर उठ जाती है। कई बार तो पूरी रात खौफ के साए में जागकर ही बीत जाती है।
उसके पापा काम के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते थे। जब भी वे घर आते, वाणी डरी-सहमी रहती और उनसे दूरी बनाए रखती। अपने भाई पार्थ से भी वह थोड़ा खिंची-खिंची रहती थी।
वैसे तो भाई-बहन में अक्सर झगड़ा होता है, लेकिन पार्थ अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता था। **वाणी की कहानी** में छिपे इस गहरे डर का अहसास पार्थ को भी था। उसने कई बार मम्मी और दादी से पूछने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसे कुछ नहीं बताया।
पूर्वी का आगमन और पार्थ की पहली नज़र
थोड़ी देर बाद पूर्वी अपनी मम्मी के साथ वाणी के घर मिलने आई। पूर्वी गाँव में कम ही लोगों को जानती थी, क्योंकि उसकी शुरुआती पढ़ाई मौसी के घर रहकर हुई थी। इंटरमीडिएट के बाद वह अब यहाँ कॉलेज करने आई थी।
पूर्वी बहुत सुंदर थी—गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और आधुनिक पहनावा। जब पार्थ ने पहली बार पूर्वी को देखा, तो जैसे देखता ही रह गया।
पूर्वी की मम्मी ने वाणी से कहा, “बेटा, अब से तुम दोनों साथ में ही कॉलेज जाया करना। पूर्वी को यहाँ एक साल हो गया है, तो इसे सब रास्तों का पता है।” दरअसल, पूर्वी ने अपनी मम्मी से कहा था कि वाणी बहुत डरपोक है और बात-बात पर असहज हो जाती है। इसी हमदर्दी में वे उससे मिलने आए थे। इस बात से वाणी को भी दिलासा मिला कि अब कॉलेज में पूर्वी उसके साथ होगी।
रात का दौरा और दादी की अनसुलझी चिंता
रात को खाना खाने के बाद सब सोने चले गए, लेकिन वाणी की आंखों में नींद नहीं थी। वह बार-बार करवट बदल रही थी।
दादी ने पूछा, “क्या हुआ बेटा, नींद नहीं आ रही?”
वाणी ने घबराते हुए कहा, “दादी, डर लग रहा है,” और उनसे चिपक कर सो गई।
कुछ ही देर में वाणी को वही भयानक दौरे पड़ने शुरू हो गए। उसका शरीर अकड़ने लगा और हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। चीख-पुकार सुनकर मम्मी और पार्थ भी भागकर कमरे में आए। सब मिलकर उसके हाथ-पैर और सर सहलाने लगे। काफी देर बाद वाणी थोड़ी सामान्य हुई।
जब सब अपने कमरे में चले गए, तब दादी देर तक जागती रहीं। उनके मन में **वाणी की कहानी** का वह भयावह अतीत घूम रहा था। वे मन ही मन सोच रही थीं:
‘हम सब मिलकर भी वाणी को उस पुराने ट्रॉमा से बाहर नहीं निकाल पाए। क्या कभी कोई ऐसा जीवनसाथी मिलेगा जो मेरी बच्ची के इस डर को समझेगा?’* दादी ने ईश्वर से प्रार्थना की, *”हे भगवान! मेरी वाणी को इस डर के साए से निकालकर मोहब्बत की छाँव देना।”
(To be continued…)
लेखिका – ममता जायसवाल










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