सुबह की कविता
खिलौने बदल गए
बीते बचपन में जाना
कोई यात्रा नहीं।
एक कमरे में लौटना है
जहाँ दरी वही है।
बस्ते का बोझ कंधे पर।
फटी पेंट की सिलाई।
शाम के भात से पहले
आँतों में कुलबुलाती भूख।
पिता के रेडियो पर
बी बी सी के बाद ठहरती उँगली
आजकल।
फिर वह वाक्य
जो घर में सबसे मीठा लगता—
समाचार समाप्त हुए।
दीदी की झिड़की।
पिता की हल्की मार।
सी ए टी — कैट, कैट माने ‘चूहा’। ।
आर ए टी — रैट, रैट माने ‘बिल्ली’
अनजाने,उल्टा बोलने पर
डांट से बचने की वही सफाई—
क्लास में उसके दोस्त बदमाश हैं।
साइकिल के कैरियर पर कंडे।
घर तक यह सोच
कि घर हमसे भी चलता है।
चार शरीर।
एक चादर।
जमीन की ठंड।
नकली झगड़ा।
फिर नींद।
बड़े लड़कों के मैदान का डर।
शतरंज में जानबूझकर हार
और गुरुजी को एक दिन हराने का सुख।
बाज़ार की धूल में पाँच पैसे
फिर एक जलेबी
जो आज भी जीभ पर बैठती है।
आज
डायनिंग टेबल पर
स्कॉटलैंड से आए
बच्चों का
पिता से
मासूम सवाल—
पापा, चावल हाथ से क्यों?
हाइजीनिक नहीं है।
पिज़्ज़ा हट के काउंटर पर
पूजा के दिन का झिझकता निवाला।
डांट के बाद भी
गरम पिज़्ज़ा
और वही शरारती भोली मुस्कान।
दरी ठंडी थी।
पिज़्ज़ा गरम है।
दोनों को ओढ़ने वाला
एक ही बचपन है।
दरी ओढ़कर सोए थे हम।
पिज़्ज़ा ओढ़कर सोते हैं वे।
सुबह दोनों पर एक जैसी उठती है।
खिलौने बदल गए—
बचपन नहीं।
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— प्रभात दत्त झा
देवेंद्रनगर, नेहरूनगर
बिलासपुर, छत्तीसगढ़ — 495001







