जब शब्द दिल की बात कहने लगें

जब शब्द दिल की बात कहने लगें

अकेले कोने में बैठी हुई,
अक्सर मैं खुद से बातें किया करती हूँ,
न जाने इस दिल का हाल क्या है—
कभी बेचैन, तो कभी बेफ़िक्र सा रहता है।

कभी किसी के लिए तड़पता है,
तो कभी किसी से बेइंतहा मोहब्बत करता है,
कभी दिल के कुछ अल्फ़ाज़
सिर्फ़ दिल में ही रह जाते हैं,
और कभी उतर जाते हैं
डायरी के ख़ामोश पन्नों पर।

कभी यही दिल
कुछ ख़्वाब सजाता है,
तो कभी उन्हीं ख़्वाबों के बीच
खुद को टूटता हुआ पाता है।

अकेले समय को काटना
जब बहुत मुश्किल हो जाता है,
तब शुरू होता है
शब्दों का एक अनकहा खेल।

कभी हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ
अपनी ख़्वाबों की दुनिया सजाने लगता है,
कभी खुद को आसमान की ऊँचाइयों पर देखता है,
तो कभी खुद से ही कहता है—
“हिम्मत मत हार,
सब ठीक हो जाएगा…”

और फिर मुस्कुरा देता है।

बार-बार टूटकर भी
तुम खुद को हँसा कैसे लेती हो?

दिल के किसी कोने से
एक धीमी-सी आवाज़ आती है—

“अरे बुद्धू…
यही तो जादू है।
टूटकर भी मुस्कुरा लेना,
बिखरकर भी ख़्वाब सजा लेना,
और हर बार खुद को
फिर से समेट लेना…
यही तो ज़िंदगी है।”

बस यूँ ही,
दिल और शब्दों के बीच
ये सिलसिला चलता रहता है…

कभी ख़ामोशी बोलती है,
कभी आँखें लिखती हैं,
और कभी—
शब्द दिल की बात कहने लगते हैं।

— विधि सैनी

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