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एक चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई

कुंदन राज दत्ता "निश्छल" • Superstar Writer • Sahitya Ratna

एक चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई

पता नहीं ये चिट्ठी क्यों लिख रहा हूँ,
जबकि ये भी पता है कि तुम्हें कभी दूँगा नहीं।
शायद कुछ बातें होती हैं,
जो कहने से ज्यादा लिख देने पर हल्की लगती हैं।

बहुत कुछ कहना था तुमसे,
लेकिन तुम्हारे सामने आते ही
न जाने क्यों मैं इतना कम बोलने लगता था।
जो बात पूरी रात सोचता था,
वही तुम्हारे सामने आकर भूल जाता था।

तुम्हें शायद कभी एहसास भी नहीं हुआ,
कि तुम्हारी छोटी-छोटी बातें मुझे कितनी याद रहती थीं।
तुम्हारा बिना वजह हँसना,
बात करते-करते अचानक चुप हो जाना,
और फिर पूछना “क्या हुआ?”

मैं हर बार कहना चाहता था
“कुछ नहीं, बस तुम्हें देख रहा हूँ।”
लेकिन हर बार वही पुराना जवाब दिया,
“कुछ नहीं हुआ।”

सच कहूँ तो मुझे डर लगता था।
डर इस बात का नहीं कि तुम मुझे मना कर दोगी,
डर इस बात का था कि
कहीं मेरे कहने के बाद तुम मुझसे बात करना ही न छोड़ दो।

इसलिए मैंने अपने मन की बात
अपने मन में ही रखी।

तुम्हारे साथ बिताए हुए कुछ पल
शायद तुम्हारे लिए बहुत मामूली होंगे,
लेकिन मैंने उन्हें जाने क्यों
इतनी गंभीरता से संभालकर रखा है।

कभी-कभी पुरानी बातें याद आती हैं
तो बिना वजह मुस्कुरा देता हूँ।
फिर खुद पर ही हँसी आती है
कि मैं भी कितना अजीब था।

तुम्हें पसंद क्या है,
तुम किस बात पर खुश होती हो,
किस बात पर नाराज़
ये सब याद था मुझे।

बस एक चीज़ कभी नहीं समझ पाया,
कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए क्या था।

शायद कुछ भी नहीं।
और शायद यही ठीक भी है।

हर कहानी का साथ में खत्म होना जरूरी नहीं होता।
कुछ लोग बस इसलिए मिलते हैं
कि उनके जाने के बाद भी
उनकी याद हमारे साथ बनी रहे।

तुम मेरे लिए ऐसी ही एक याद हो।

मैंने तुम्हें कभी पाने की ज़िद नहीं की,
क्योंकि मुझे पता था
कि प्यार में किसी को अपना बनाना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी किसी को चुपचाप चाहना भी काफी होता है।

अगर कभी तुम्हें ये चिट्ठी मिल जाए,
तो इसे पढ़कर परेशान मत होना।
मुझसे कोई जवाब मत देना।

बस इतना समझ लेना
कि एक इंसान था
जिसने तुम्हें सच में चाहा था,
लेकिन कहने की हिम्मत नहीं कर पाया।

और हाँ,
अगर कभी मेरी याद आए,
तो मुझे उस लड़के की तरह याद करना
जो तुम्हारे सामने बैठकर भी
अपने दिल की बात नहीं कह पाया।

शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमी थी।

और शायद…
मेरी मोहब्बत भी।

ये चिट्ठी यहीं खत्म करता हूँ।
तुम्हें भेजूँगा नहीं,
जैसे बहुत सारी बातें तुम्हें कभी बताई नहीं।

बस कागज़ पर लिखकर रख देता हूँ।

शायद किसी दिन
मैं इसे पढ़ूँगा
और सोचूँगा

काश, उस दिन कह दिया होता।

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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