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भीड़ में अकेलापन : एक दास्तान

कुंदन राज दत्ता "निश्छल" • Superstar Writer • Sahitya Ratna

भीड़ में अकेलापन : एक दास्तान

हजारों चेहरों के बीच भी, अपना कोई नहीं लगता,
भीड़ बहुत होती है मगर, दिल फिर भी तन्हा रहता।

हर कोई अपने रास्ते में, जाने कहाँ खोया है,
किसी की आँखों में हँसी है, किसी का मन रोया है।

शहर की इन भागती सड़कों पर, कदम सभी के चलते हैं,
पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो भीतर से रोज़ ढलते हैं।

कंधे से कंधा टकराता है, फिर भी दूरी रहती है,
पास बैठा इंसान भी कभी, दिल से दूर ही रहता है।

कहने को तो दोस्तों की, लंबी एक कतार है,
लेकिन दुख की एक घड़ी में, कौन सच में मेरे साथ है?

फोन में कितने नाम पड़े हैं, कितनी तस्वीरें हैं,
फिर भी रात के सन्नाटे में, बस अपनी ही आवाज़ें हैं।

कभी किसी से बात करने को, मन बहुत मचलता है,
पर सामने आते ही जाने क्यों, शब्दों का गला घुटता है।

हम भी कभी बेफिक्र थे, हँसते थे खुलकर,
अब मुस्कान भी रख लेते हैं, बस दुनिया से डरकर।

लोग समझते हैं खुश हैं हम, क्योंकि हँसते रहते हैं,
कौन बताए कुछ दर्द ऐसे हैं, जो आँखों में नहीं बहते हैं।

किसी के लौट आने की अब, उम्मीद भी नहीं रखते,
फिर भी जाने क्यों दरवाज़े पर, आहट सुनते रहते।

कुछ रिश्ते वक्त के हाथों में, चुपचाप बिखर जाते हैं,
और कुछ लोग साथ रहकर भी, अजनबी हो जाते हैं।

अकेलापन सिर्फ कमरे में, अकेले होने का नाम नहीं,
भीड़ में खुद को खो देना भी, इससे कम कोई ग़म नहीं।

कभी-कभी बस कोई पूछ ले, “तुम सच में ठीक तो हो?”
शायद उस एक सवाल में ही, आधा दर्द कहीं खो जाए।

मगर यहाँ किसे फुर्सत है, किसी का मन पढ़ने की,
सबको जल्दी है अपनी कहानी, दुनिया को सुनाने की।

इसलिए मैं भी चुप हूँ अब, और चुपचाप सहता हूँ,
भीड़ के बीच खड़ा होकर भी, खुद से बातें करता हूँ।

शायद एक दिन कोई मिलेगा, जो खामोशी समझ पाएगा,
चेहरे की मुस्कान के पीछे, छुपा दर्द भी पढ़ पाएगा।

तब शायद ये तन्हाई भी, कोई खूबसूरत दास्तान बने,
और भीड़ के इस शहर में, कोई अपना मेरे पास खड़ा मिले।

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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Author

Muktika Sahityakar