# **मेरी कलम मेरी पहचान**
जब-जब मन के आँगन में
कोई पीड़ा अतिथि बन आई,
शब्दों ने उसका हाथ थामा,
फ़िर कलम बनी मेरी परछाईं।
जो आँसू पलकों तक आए,
उनको मोती कर डाला,
जो दर्द हृदय में रहा दबा,
उसको अक्षर-अक्षर कर ढाला।
मैंने अपने मौन को देकर
शब्दों का एक क्षितिज चुना
खुद को ख़ुद से खोज लिया
फ़िर कलम बनी मेरी पहचान।
कभी समय ने घाव दिए तो
कलम बनी मेरी उपचार
कभी अकेलेपन ने घेरा,
वो बन बैठी मेरी हमराज़ ।
टूटे सपनों की किरचों से
मैंने नव विश्वास बुना,
राख हुई हर एक उम्मीद में
फिर जीवन का रंग चुना।
मेरी स्याही सिर्फ स्याही नहीं
हृदय का रिसता रक्त है,
हर अक्षर में घुलती साँसें मेरी,
हर पंक्ति में मेरा सत्य है।
मैंने देखा है शब्दों को,
पत्थर जैसे मन पिघलाते,
सूनी आँखों में उम्मीदों के
फिर से सुन्दर दीप जलाते।
इसलिए न मैं मौन रहूँगी,
न सच से मुँह मोड़ूँगी,
जहाँ ज़रूरत होगी
वहाँ कलम मैं जोड़ूँगी।
कलम मेरी ढाल भी है और
कलम ही मेरा स्वाभिमान,
मेरे होने का अर्थ यही है,
मेरी साँसों का अभिमान।
जब तक मन में भाव रहेंगे,
जब तक धड़कन में अरमान,
तब तक मेरी कलम चलेगी,
मेरे शब्द बनेगें मेरी पहचान।
न पद मिले, न यश मिले तो
फिर भी कोई मलाल नहीं,
मेरे शब्द से किसी के मन में
जग जाए आशा-बस हो कमाल यही।
किसी निराश मन के भीतर
जगा सके जीने की आस,
तब सार्थक होगी मेरी लेखनी,
जब शब्द बनें किसी की साँस।
और यदि कभी पूछे कोई,
“तुम आखिर हो कौन?”
मैं मुस्काकर कह दूँगी—
मेरी रूह है मेरी कलम,
और कलम ही मेरी पहचान।
स्वरचित ✍
स्वीटी श्रीवास्तव
वाराणसी







