जिंदगी का सबसे मुश्किल फैसला
“अब तक का सबसे मुश्किल फैसला
तेइस, चौबीस साल… कोई छोटी अवधि नहीं होती। इतने वर्षों में एक घर की दीवारों से अपनापन हो जाता है, आँगन की मिट्टी अपनी लगने लगती है और # अब तक का सबसे मुश्किल फैसला
बाईस साल… कोई छोटी अवधि नहीं होती। इतने वर्षों में एक घर की दीवारों से अपनापन हो जाता है, आँगन की मिट्टी अपनी लगने लगती है और रिश्तों को निभाते-निभाते इंसान अपनी अलग पहचान तक भूल जाता है।
उसने भी इस घर को अपना समझकर हर रिश्ता निभाया था। परिवार की खुशियों में अपनी खुशी खोजी, अपनों की नाराज़गी में अपनी गलती तलाश की और घर की शांति के लिए कई बार अपनी बात को मन में ही दबा लिया।
उसे विश्वास था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। उसकी भावनाएँ समझी जाएँगी, उसके विचारों को भी महत्त्व मिलेगा और एक दिन उसे भी इस घर में अपनी पहचान के साथ स्वीकार किया जाएगा।
लेकिन कुछ प्रतीक्षाओं का अंत नहीं होता।
isse bhi padhein : बचपन वाली दुर्गा पूजा
धीरे-धीरे उसके लिए कही जाने वाली बातें उसके मन पर बोझ बनने लगीं। कभी उसके माता-पिता के लिए कटु शब्द, कभी उसके पति के लिए अनावश्यक टिप्पणियाँ और कभी स्वयं उसके अस्तित्व पर प्रश्न। वह हर बार चुप रह जाती। उसे लगता, जवाब देने से बात बढ़ेगी और चुप रहने से शायद घर की शांति बनी रहेगी।
मगर घर की शांति बनाए रखने की कीमत वह अपने भीतर चुकाने लगी थी।
उसकी हँसी कम होने लगी। छोटी-छोटी बातों में मन घबराने लगा। रात को बिस्तर पर लेटती तो दिनभर की बातें मन में घूमने लगतीं। धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति और स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा। बाहर से वह परिवार का हिस्सा थी, लेकिन भीतर से अपने ही जीवन में अकेली होती जा रही थी।
एक दिन आईने के सामने खड़ी होकर उसने स्वयं को बहुत देर तक देखा। चेहरा वही था, घर वही था, जीवन भी वही था; मगर आँखों में पहले वाली चमक नहीं थी।
उसने खुद से पूछा, “क्या रिश्ते निभाने का अर्थ यही है कि इंसान धीरे-धीरे खुद से ही रिश्ता तोड़ ले?”
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था, लेकिन अब वह अपनी पीड़ा को नकार नहीं सकती थी।
फैसला लेना आसान नहीं था। सामने कोई पराया नहीं, उसकी सास थीं। बाईस वर्षों का साथ था, परिवार की मर्यादा थी और समाज की अपनी अपेक्षाएँ थीं। उसे डर था कि उसके निर्णय को गलत समझा जाएगा। लोग उसके धैर्य को भूलकर उसकी दूरी पर सवाल उठाएँगे।
और सबसे कठिन था अपने ही मन को समझाना। क्या अपने सुकून के लिए किसी अपने से दूरी बनाना गलत था? क्या इतने वर्षों तक निभाए गए रिश्ते उसे जीवन भर अपनी भावनाओं को अनदेखा करने के लिए बाध्य करते थे?
कई दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रही। एक ओर रिश्तों को बचाने की चाह थी, दूसरी ओर अपने भीतर बची हुई शांति को बचाने की आवश्यकता।
आखिर उसने अपनी सास से दूरी बनाने का निर्णय लिया।
यह निर्णय क्रोध में उठाया गया कदम नहीं था। इसके पीछे वर्षों की थकान थी, अनकहे शब्द थे और वह पीड़ा थी, जिसे वह सबसे छिपाती रही थी। उसने रिश्ते की गरिमा बनाए रखते हुए अपने लिए कुछ सीमाएँ तय करने का निश्चय किया।
फिर भी निर्णय लेने के बाद सब आसान नहीं हुआ। कभी पुरानी यादें उसे रोकतीं, कभी मन में अपराधबोध जागता। कभी सोचती कि शायद वह कुछ और सह लेती, तो परिस्थितियाँ बदल जातीं। लेकिन फिर उसे अपना वह बीता हुआ समय याद आता, जब सबको सँभालते-सँभालते वह स्वयं को सँभालना भूल गई थी।
उसने समझ लिया कि किसी रिश्ते का सम्मान करना और उस रिश्ते में अपनी हर पीड़ा को अनदेखा करते रहना दो अलग बातें हैं।
समय के साथ उसने अपने मन को फिर से समझना शुरू किया। अब वह अपनी भावनाओं को गलत नहीं मानती थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि हर व्यक्ति उसके निर्णय को समझे, यह आवश्यक नहीं; लेकिन दूसरों की असहमति के कारण अपने अनुभवों को झुठलाना भी उचित नहीं।
वह किसी से जीतना नहीं चाहती थी। उसे किसी को गलत साबित भी नहीं करना था। वह बस अपने जीवन में इतना स्थान चाहती थी, जहाँ वह बिना भय और अपराधबोध के साँस ले सके।
बाईस वर्षों के बाद लिया गया उसका यह निर्णय किसी उत्सव की तरह नहीं आया था। इसमें न कोई विजय का शोर था, न किसी से शिकायत करने की इच्छा। बस एक थकी हुई स्त्री थी, जिसने बहुत सोचने के बाद अपने लिए एक कठिन रास्ता चुना था।
**उसके जीवन का सबसे मुश्किल फैसला किसी अपने से दूरी बनाना नहीं था, बल्कि यह स्वीकार करना था कि रिश्तों को बचाते-बचाते स्वयं को खो देना भी कोई समाधान नहीं है।**
क्योंकि कभी-कभी जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर दब चुकी उस आवाज़ का हाथ थामना पड़ता है, जो बरसों से कह रही होती है—अब स्वयं के लिए भी जीना सीखो।
— © स्वीटी श्रीवास्तव
*जज़्बातों की पोटली से*रिश्तों को निभाते-निभाते इंसान अपनी अलग पहचान तक भूल जाता है।
उसने भी इस घर को अपना समझकर हर रिश्ता निभाया था। परिवार की खुशियों में अपनी खुशी खोजी, अपनों की नाराज़गी में अपनी गलती तलाश की और घर की शांति के लिए कई बार अपनी बात को मन में ही दबा लिया।
उसे विश्वास था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। उसकी भावनाएँ समझी जाएँगी, उसके विचारों को भी महत्त्व मिलेगा और एक दिन उसे भी इस घर में अपनी पहचान के साथ स्वीकार किया जाएगा।
लेकिन कुछ प्रतीक्षाओं का अंत नहीं होता।
धीरे-धीरे उसके लिए कही जाने वाली बातें उसके मन पर बोझ बनने लगीं। कभी उसके माता-पिता के लिए कटु शब्द, कभी उसके पति के लिए अनावश्यक टिप्पणियाँ और कभी स्वयं उसके अस्तित्व पर प्रश्न। वह हर बार चुप रह जाती। उसे लगता, जवाब देने से बात बढ़ेगी और चुप रहने से शायद घर की शांति बनी रहेगी।
मगर घर की शांति बनाए रखने की कीमत वह अपने भीतर चुकाने लगी थी।
उसकी हँसी कम होने लगी। छोटी-छोटी बातों में मन घबराने लगा। रात को बिस्तर पर लेटती तो दिनभर की बातें मन में घूमने लगतीं। धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति और स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा। बाहर से वह परिवार का हिस्सा थी, लेकिन भीतर से अपने ही जीवन में अकेली होती जा रही थी।
एक दिन आईने के सामने खड़ी होकर उसने स्वयं को बहुत देर तक देखा। चेहरा वही था, घर वही था, जीवन भी वही था; मगर आँखों में पहले वाली चमक नहीं थी।
उसने खुद से पूछा, “क्या रिश्ते निभाने का अर्थ यही है कि इंसान धीरे-धीरे खुद से ही रिश्ता तोड़ ले?”
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था, लेकिन अब वह अपनी पीड़ा को नकार नहीं सकती थी।
फैसला लेना आसान नहीं था। सामने कोई पराया नहीं, उसकी सास थीं। बाईस वर्षों का साथ था, परिवार की मर्यादा थी और समाज की अपनी अपेक्षाएँ थीं। उसे डर था कि उसके निर्णय को गलत समझा जाएगा। लोग उसके धैर्य को भूलकर उसकी दूरी पर सवाल उठाएँगे।
और सबसे कठिन था अपने ही मन को समझाना। क्या अपने सुकून के लिए किसी अपने से दूरी बनाना गलत था? क्या इतने वर्षों तक निभाए गए रिश्ते उसे जीवन भर अपनी भावनाओं को अनदेखा करने के लिए बाध्य करते थे?
कई दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रही। एक ओर रिश्तों को बचाने की चाह थी, दूसरी ओर अपने भीतर बची हुई शांति को बचाने की आवश्यकता।
आखिर उसने अपनी सास से दूरी बनाने का निर्णय लिया।
यह निर्णय क्रोध में उठाया गया कदम नहीं था। इसके पीछे वर्षों की थकान थी, अनकहे शब्द थे और वह पीड़ा थी, जिसे वह सबसे छिपाती रही थी। उसने रिश्ते की गरिमा बनाए रखते हुए अपने लिए कुछ सीमाएँ तय करने का निश्चय किया।
फिर भी निर्णय लेने के बाद सब आसान नहीं हुआ। कभी पुरानी यादें उसे रोकतीं, कभी मन में अपराधबोध जागता। कभी सोचती कि शायद वह कुछ और सह लेती, तो परिस्थितियाँ बदल जातीं। लेकिन फिर उसे अपना वह बीता हुआ समय याद आता, जब सबको सँभालते-सँभालते वह स्वयं को सँभालना भूल गई थी।
उसने समझ लिया कि किसी रिश्ते का सम्मान करना और उस रिश्ते में अपनी हर पीड़ा को अनदेखा करते रहना दो अलग बातें हैं।
समय के साथ उसने अपने मन को फिर से समझना शुरू किया। अब वह अपनी भावनाओं को गलत नहीं मानती थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि हर व्यक्ति उसके निर्णय को समझे, यह आवश्यक नहीं; लेकिन दूसरों की असहमति के कारण अपने अनुभवों को झुठलाना भी उचित नहीं।
वह किसी से जीतना नहीं चाहती थी। उसे किसी को गलत साबित भी नहीं करना था। वह बस अपने जीवन में इतना स्थान चाहती थी, जहाँ वह बिना भय और अपराधबोध के साँस ले सके।
बाईस वर्षों के बाद लिया गया उसका यह निर्णय किसी उत्सव की तरह नहीं आया था। इसमें न कोई विजय का शोर था, न किसी से शिकायत करने की इच्छा। बस एक थकी हुई स्त्री थी, जिसने बहुत सोचने के बाद अपने लिए एक कठिन रास्ता चुना था।
**उसके जीवन का सबसे मुश्किल फैसला किसी अपने से दूरी बनाना नहीं था, बल्कि यह स्वीकार करना था कि रिश्तों को बचाते-बचाते स्वयं को खो देना भी कोई समाधान नहीं है।**
क्योंकि कभी-कभी जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर दब चुकी उस आवाज़ का हाथ थामना पड़ता है, जो बरसों से कह रही होती है—अब स्वयं के लिए भी जीना सीखो।
© स्वीटी श्रीवास्तव
जज़्बातों की पोटली से
Whatsapp Number : usp_whatsapp : 8808446666
Support Writer
Agar Sweety Srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








