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सागर हूँ मैं

Sweety srivastava • Superstar Writer • Sahitya Ratna

सागर हूँ मैं

सागर हूँ, हर दर्द को गहराई में छुपा लेती हूँ,
लहरों की तरह उठती हूँ, फिर खुद को सँभाल लेती हूँ।
मेरी खामोशी को मेरी कमज़ोरी समझने वालों,
मैं तूफ़ानों में भी अपना अस्तित्व बचा लेती हूँ।

कितने ही पत्थर आकर मेरी राह रोकते हैं,
कितने ही तूफ़ान मेरे तट से टकराते हैं।
मैं हर चोट को सीने में उतार तो लेती हूँ,
पर अपनी गहराई के अर्थ नहीं भूलती हूँ।

कभी शांत हूँ, तो इसे मेरी हार मत समझना,
मेरे मौन को मेरी स्वीकारोक्ति मत समझना।
मेरी लहरों में भी एक कहानी पलती है,
मेरी खामोशी में भी एक दुनिया चलती है।

नदियों-सी बहकर मैंने जीवन को अपनाया है,
अपने भीतर जाने कितने मौसमों को समाया है।
जो आया, उसे जगह दी, जो गया, उसे जाने दिया,
हर अनुभव ने मुझे और गहरा बनाया है।

मैं टूटकर भी अपनी पहचान नहीं खोती,
हर ठोकर पर अपनी उड़ान नहीं खोती।
मेरी गहराई को कौन माप पाया है,
मैंने हर अँधेरे में अपना दीप जलाया है।

सागर हूँ मैं, मेरा विस्तार छोटा नहीं,
मेरे हौसलों का कोई किनारा नहीं।
लहरों का उठना ही मेरी कहानी नहीं,
हर तूफ़ान के बाद ठहरना भी मेरी निशानी है।

स्वरचित
© स्वीटी श्रीवास्तव
जज़्बातों की पोटली से
वाराणसी

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Author

Muktika Sahityakar