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चलती रही तो राह बनती गई

 चलती रही तो राह बनती गई काँटों भरी राहों पर भी, हँसकर चलती रही, आँधियों में आशा का दीप बनकर जलती रही। कदम-कदम पर ठोकरें थीं, प्रश्नों के जंजाल थे, मेरे दृढ़ संकल्प के आगे, बौने हर व्यवधान थे। किसी ने कहा, ठहर जा, मंज़िल बहुत दूर है, मैंने कहा, चलते रहना ही, सपनों का … Read more

सागर हूँ मैं

सागर हूँ मैं सागर हूँ, हर दर्द को गहराई में छुपा लेती हूँ, लहरों की तरह उठती हूँ, फिर खुद को सँभाल लेती हूँ। मेरी खामोशी को मेरी कमज़ोरी समझने वालों, मैं तूफ़ानों में भी अपना अस्तित्व बचा लेती हूँ। कितने ही पत्थर आकर मेरी राह रोकते हैं, कितने ही तूफ़ान मेरे तट से टकराते … Read more

टूटकर भी निखरना

टूटकर भी निखरना रेज़ा-रेज़ा बिखरी तो क्या, हिम्मत मेरी टूटी नहीं, आँधियों के बीच भी उम्मीद मेरी छूटी नहीं। हर टुकड़े को जोड़कर फिर ख़ुद को सँवार लिया, ज़िंदगी ने जितना तोड़ा, मैंने उतना निखार लिया। राहों में काँटे मिले, फिर भी कदम रुके नहीं, आँखों में आँसू थे, पर सपने कभी झुके नहीं। जिसने … Read more