चलती रही तो राह बनती गई
चलती रही तो राह बनती गई काँटों भरी राहों पर भी, हँसकर चलती रही, आँधियों में आशा का दीप बनकर जलती रही। कदम-कदम पर ठोकरें थीं, प्रश्नों के जंजाल थे, मेरे दृढ़ संकल्प के आगे, बौने हर व्यवधान थे। किसी ने कहा, ठहर जा, मंज़िल बहुत दूर है, मैंने कहा, चलते रहना ही, सपनों का … Read more