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बचपन वाली दुर्गा पूजा

Sweety Srivastava • Superstar Writer • Sahitya Ratna

बचपन वाली दुर्गा पूजा 

(संस्मरण )

बचपन वाली दुर्गा पूजा कालीबाड़ी की माँ

बचपन की कुछ यादें समय की धूल से कभी धुँधली नहीं पड़तीं। त्योहारों की खुशबू, अपनों का साथ और उन दिनों की छोटी-छोटी खुशियाँ मन के किसी कोने में हमेशा जीवित रहती हैं। जब भी दुर्गा पूजा की बात होती है, मेरा मन अनायास ही गोरखपुर के अपने बचपन में लौट जाता है। आँखों के सामने कालीबाड़ी की माँ दुर्गा की छवि उभर आती है और स्मृतियों के बंद दरवाज़े धीरे-धीरे खुलने लगते हैं।

गोरखपुर में दुर्गा पूजा का उत्सव अपने आप में अनूठा था। जगह-जगह सजे पंडाल, माँ दुर्गा की मनमोहक प्रतिमाएँ और भक्तों की उमंग से पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठता था। हर पंडाल की अपनी सजावट और अपनी अलग छटा होती थी। लेकिन कालीबाड़ी की माँ के प्रति मन में एक विशेष श्रद्धा और अपनापन था। माँ के दर्शन करना, पंडाल की रौनक निहारना और उस भक्तिमय वातावरण में खो जाना, बचपन की सबसे प्यारी अनुभूतियों में शामिल था।

लेकिन दुर्गा पूजा की सबसे अनोखी स्मृति विसर्जन के दिन से जुड़ी है। हमारे घर के रास्ते से ही माँ दुर्गा की सारी प्रतिमाएँ विसर्जन के लिए निकला करती थीं। उस दिन हमारे घर के आसपास का दृश्य ही बदल जाता था। घर सजाए जाते, सड़कें सजावट से जगमगा उठतीं और हर ओर उत्सव का उल्लास दिखाई देता। ऐसा लगता, मानो पूरा मोहल्ला मिलकर माँ को विदाई देने के लिए तैयार हो रहा हो।

हमारे घर की छत भी उस दिन एक खास जगह बन जाती थी। आसपास के लोग अपनेपन के साथ एक-दूसरे के घरों में आते, छतों पर जगह बनती और सब मिलकर माँ की प्रतिमाओं के दर्शन करते। न कोई औपचारिकता, न कोई बनावट—बस आत्मीयता से भरे रिश्ते और साझा खुशियाँ। ढोल-नगाड़ों की गूँज, जयकारों की आवाज़ और माँ के दर्शन के लिए उमड़ता जनसमूह उस दृश्य को अविस्मरणीय बना देता था।

आज सोचती हूँ तो लगता है कि उस समय केवल घर ही नहीं सजते थे, दिल भी सजते थे। पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं, परिवार का हिस्सा लगते थे। किसी के घर की छत सबकी हो जाती थी और किसी की खुशी पूरे मोहल्ले की खुशी बन जाती थी।

समय बदला, जीवन की राहें बदलीं, बचपन पीछे छूट गया, लेकिन कालीबाड़ी की माँ और विसर्जन के वे दृश्य आज भी स्मृतियों में वैसे ही बसे हैं। आज भी माँ दुर्गा के सामने शीश झुकाती हूँ, तो मन उन्हीं गलियों में पहुँच जाता है, जहाँ श्रद्धा के साथ रिश्तों की गर्माहट भी बहती थी।

सचमुच, बचपन वाली दुर्गा पूजा केवल माँ की आराधना नहीं थी, वह अपनेपन, सामूहिक उल्लास और उन रिश्तों का उत्सव थी, जिनकी मिठास आज भी मन को भावुक कर देती है।

© स्वीटी श्रीवास्तव
जज़्बातों की पोटली से
वाराणसी, उत्तरप्रदेश

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Author

Muktika Sahityakar