पीर से प्रखरता तक
मन की पीर कहूँ किससे, मन ही मन सहती हूँ,
हँसकर दुनिया के आगे, भीतर से मैं बहती हूँ।
आँखों में जो ठहरा सावन, किसको दिखलाऊँ मैं,
होठों पर मुस्कान सजा, सबसे दर्द छिपाऊँ मैं।
अपने ही कुछ प्रश्नों का, उत्तर कभी नहीं मिला,
भीड़ बहुत थी चारों ओर, फिर भी कोई न मिला।
जिनको अपना समझा मैंने, वही पराए निकले,
मेरे हिस्से के दीपक भी, जाने क्यों बुझ निकले।
टूटी उम्मीदों की किरचें, अब भी दिल में चुभती हैं,
खामोशी की सिलवट में भी, बहुत- सी आहें उठती हैं।
फिर भी मैंने पीर को अपनी, हार नहीं बनने दी,
आँसू की हर बूँद ने मुझमें, एक नई लौ भर दी।
अब मन की इस पीड़ा से भी, रिश्ता मेरा गहरा है,
दर्द भले ही साथ रहा हो, हौसला मेरा सुनहरा है।
मन की पीर कहूँ किससे, मन ही मन सहती हूँ,
टूट-टूटकर भी जीवन में, हर दिन फिर से संवरती हूँ।
❝© स्वीटी श्रीवास्तव❞
*जज़्बातों की पोटली से*
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Agar Sweety srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








