पीर से प्रखरता तक
पीर से प्रखरता तक मन की पीर कहूँ किससे, मन ही मन सहती हूँ, हँसकर दुनिया के आगे, भीतर से मैं बहती हूँ। आँखों में जो ठहरा सावन, किसको दिखलाऊँ मैं, होठों पर मुस्कान सजा, सबसे दर्द छिपाऊँ मैं। अपने ही कुछ प्रश्नों का, उत्तर कभी नहीं मिला, भीड़ बहुत थी चारों ओर, फिर भी … Read more