“अनकहा एहसास”
रवि एक साधारण लेकिन सच्चे दिल वाला लड़का था। उसकी दुनिया में सादगी थी, पर दिल में अनंत प्रेम की गहराई। उसे दिव्या से प्रेम हो गया था। दिव्या खूबसूरत, समझदार और महत्वाकांक्षी थी। लेकिन रवि की तरह उसका प्रेम सीधा-सादा नहीं था।
दिव्या को अर्जुन पसंद था—एक अमीर बिज़नेसमैन का बेटा। उसकी आलीशान गाड़ी, महंगे कपड़े और रौबदार अंदाज ने दिव्या को आकर्षित किया था। वह रवि की भावनाओं से अवगत थी, लेकिन उसे अनदेखा करती रही। रवि ने अपनी भावनाओं का इज़हार भी किया, पर दिव्या ने हल्के में लेते हुए कहा—
“रवि, तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच कुछ भी संभव नहीं है। अर्जुन और मैं एक-दूसरे को पसंद करते हैं।”
रवि चुप रह गया। उसे लगा कि सच्चा प्रेम किसी को पाने में नहीं, बल्कि उसे खुश देखने में होता है। उसने खुद को पीछे कर लिया।
समय बीता…
अर्जुन और दिव्या का रिश्ता शुरू में बहुत अच्छा चला। लेकिन धीरे-धीरे दिव्या को अहसास होने लगा कि अर्जुन उसे सिर्फ एक शो पीस की तरह रखता था। उसका प्रेम सतही था, स्वार्थी था। वह उसे समय नहीं देता, बस पार्टियों और महंगे तोहफों से भरमाए रखता।
एक दिन, जब अर्जुन ने दिव्या को किसी और के सामने अपमानित कर दिया, तब उसे याद आया—रवि ने कभी उसके लिए ऐसा नहीं किया था। रवि का प्रेम सच्चा था, निःस्वार्थ था। पर अब देर हो चुकी थी। रवि आगे बढ़ चुका था। उसने अपनी जिंदगी में किसी और को जगह दे दी थी—एक ऐसी लड़की को, जो उसे सच्चा प्रेम करती थी।
दिव्या को अब अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि”कभी-कभी हम जिसे चाहते हैं, वह हमारे लिए सही नहीं होता। प्रेम में सच्चाई और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए हमेशा उसे चुनें जो आपको सच्चे दिल से चाहता हो, न कि उसे जिसे आप पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हों।”
हमें हमेशा उसे अपने हृदय में स्थान देना चाहिए जो हमसे सच्चा प्रेम करता हो, न कि उसे जिसे हम प्रेम करते हैं। पर समय किसी के लिए नहीं रुकता। दिव्या के कभी न थमने वाले आंसू पश्चाताप के आगोश में समाए जा रहे थे।
रचनाकार
सुरभि श्रीवास्तव
(Surabhi Srivastava)
75, सिविल लाइन, फतेहपुर,
(उत्तर प्रदेश)
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