बचपन कभी कागज़ की नाव, पतंग की डोर, और लट्टू की लत्ती में बसा था। बारिश की रिमझिम में दौड़ते, पार्क में कबड्डी खेलते, और आंखमिचौली खेलते बच्चे दुनिया भूल जाते थे। वो फुटबॉल की किक, गली में क्रिकेट की पिच, और दोस्तों संग बेफिक्र दिन सब जैसे फाख्ता हो गए हैं। आज बच्चों के हाथों में पतंग की डोर तो नहीं है, हां मोबाइल की स्क्रीन ने उन्हें ज़रूर अपनी चमक का पतंगा (परवाना) बनाया हुआ है।
मोबाइल के इस रंगीले संसार में न दौड़ने की जगह है, न हंसने का वक्त। बारिश अब भी आती है, पर कागज़ की नाव नहीं दिखती। पतंग,लट्टू, और मैदानों की वो धूल भरी सोंधी मिट्टी की खुशबू बस यादों में रह गई है। बचपन अब मोबाइल के चार कोनों की दुनिया में सिमट कर रह गया है, जहां न खेल है, न असली हंसी, बस एक ठहरी हुई दुनिया। इस पर विडंबना यह कि आज जहां हर “Noun” Smart हो रहा है, बच्चे न Booksmart हैं , न ही Streetsmart।
तालिब हुसैन
लखनऊ, उत्तर प्रदेश








