अनमोल संपति: संस्कार heart touching emotional Hindi Story on Muktika Publication

अनमोल संपति : संस्कार

राकेश और सुनीता, आज बहुत खुश थे और हो भी क्यों ना, आज उनके इकलौते बेटे संस्कार की शादी जो थी। संस्कार एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर था। अपनी नौकरी के एक साल बाद ही उसने अपने पिता से कहा, “पापा आपने अपनी पूरी जिंदगी मुझे काबिल बनाने के लिए लगा दी। मैंने देखा है आपने 12 घंटे ड्राइवर की नौकरी कर, इतने सालों में एक बार भी आपने अपने माथे पर शिकन नहीं आने दी और मम्मी ने भी मेरी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब मैं कमाने लगा हूँ। आप अब अपना पूरा समय मम्मी को दें। आपको कमाने की जरूरत नहीं।” संस्कार की ये बात सुन दोनों माता-पिता की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। राकेश सुनीता की तरफ गर्व से देखता हुआ बोला, “देखा सुनीता ये है मेरा संस्कार, मेरी सम्पति, मेरा बेटा।” सुनीता बोली, “हाँ…..हाँ, आप ही का बेटा है।”

संस्कार जिस कंपनी में काम कर रहा था वहीं सुधा भी काम करती थी। सुधा वहां रिसेप्शनिस्ट थी। साथ काम करते-करते कब दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे पता ही नहीं चला। अब दोनों के माता-पिता की आपसी रजामंदी से शादी भी हो रही थी। दोनों परिवार बहुत खुश थे। दोनों के माता-पिता ने अपने बच्चों के फैसले का सम्मान करते हुए उनकी शादी सम्पन्न की। शादी के दो साल बाद संस्कार और सुधा  को बेटा हुआ। उसका नाम रखा ‘सार्थक’। सार्थक की चुल-बुली हरकतों से दादा-दादी (राकेश – सुनीता) का  समय कैसे बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। सुनीता ने तो अपना पूरा ध्यान अपने पोते को प्यार और दुलार में लगा लिया था। सुधा ने भी नौकरी छोड़ दी थी और घर-गृहस्थी संभालने में जुट गई थी।

राकेश और सुनीता की जिंदगी में सामान्य से कुछ ज्यादा ही अच्छा हो रहा था। कहीं कोई कलेश, कोई परेशानी नहीं हुई इन 5 सालों में।

काफी दिनों बाद संस्कार अपने माता-पिता के कमरे में आया और बोला, “पापा मैं काफ़ी व्यस्त था नौकरी में इसीलिए आप लोगों को समय नहीं दे पाया। आप दोनों से कुछ कहना चाहता हूँ।”

सुनीता बोली, “संस्कार तुम्हें हमसे बात करने के लिए अनुमति की जरूरत कब से पड़ गई, बोलो, बिना झिझके बोलो बेटा…..”

संस्कार बोला, “मम्मी आप जानते हैं सार्थक 5 वर्ष का हो गया है और अब उसे सोने और पढ़ने के लिए अलग कमरा चाहिए और हमारे यहां तीन ही कमरे हैं- एक आप दोनों का, एक सुधा और मेरा, और एक ड्राइंग रूम।”

राकेश गुस्से में बोला, “तुम कहना क्या चाहते हो? तुम लोग (संस्कार- सुधा-सार्थक) यहाँ से जा रहे हो…? तुम अलग होना चाहते हो?”

संस्कार : “नहीं पापा, मैं और सुधा कहीं नहीं जा रहे। मैंने आप दोनों के लिए एक अच्छी जगह सुनिश्चित कर ली है। वो जहां पड़ोस के काका-काकी पिछले 2 साल से रह रहे हैं। ‘आपका अपना घर’ वहीं आप दोनों का इंतजाम किया है।”

राकेश : (झल्लाता हुआ) “वृद्ध आश्रम, तू हमें वृद्ध आश्रम भेज रहा है।”

सुधा अपने कमरे के दरवाजे से सटक कर सारी बातें
सुन रही थी।

राकेश की ऊँची आवाज सुन भागती हुई आई और संस्कार के आगे कुछ बोलने से पहले बोल पड़ी, “पापा हमने सब पता कर लिया है, आप दोनों को कोई परेशानी नहीं होगी और फिर हम कोई दूर थोड़े ही भेज रहे हैं। आप जब फोन करेंगे हम पहुंच ही जायेगे।”

राकेश कुछ बोलता उससे पहले सुनीता बोल पड़ी, “कब जाना है संस्कार।” संस्कार मुस्कराते हुए बोला, “मम्मी कल।” सुधा आपका सामान बाँधने में मदद कर देगी।”

(अपना आदेश सुना संस्कार और सुधा उस कमरे से बाहर निकल गए)

सुनीता की नजर अपने दर‌वाजे के पास एक छोटी से परछाई पर पड़ी। उसने देखा, उसका 5 साल का प्यारा पोता वहां खड़ा सब सुन रहा था। सुनीता दौड़ के उसके पास गई और दुलार करती हुई उसे अपने गले से लगा लिया और रोने लगी। सार्थक अपनी दादी के रोता देख बोला, “दादी आप रो क्यों रहे हो?”

सुनीता : “सार्थक बेटा, ये तो खुशी के आँसू हैं… मेरा बेटा ‘संस्कार’ बड़ा हो गया।”

सार्थक समझ नहीं पाया। लेकिन उसके छोटे से दिमाग़ में अजीब और गरीब से प्रश्न उठ रहे थे। समझ नहीं पा रहा था। सार्थक थोड़ी देर अपने दादा-दादी के पास बैठा और फिर खेलने चला गया। अगले ही दिन राकेश और सुनीता को संस्कार वृद्ध आश्रम छोड़ने  चला गया।

समय बीतता गया। राकेश और सुनीता को 5 साल हो गए इस वृद्ध आश्रम में रहते हुए। इतने सालों में संस्कार 1 या 2 ही बार आया, वो भी अकेले। कुछ दिनों से राकेश की तबीयत बहुत खराब हो गई थी। संस्कार को फ़ोन करने पर भी वो नहीं आया। आश्रम के डॉक्टर ही राकेश का इलाज कर रहे थे। राकेश की तबीयत जब कुछ ठीक हुई तो उसने अपने पुराने दोस्त हेमंत को फोन कर घर पर बुलाया। हेमंत पेशे से वकील है। जल्दबाजी में राकेश ‘घर’ का मतलब ‘आपका अपना घर’ कहना भूल गया। हेमंत अगले ही दिन राकेश के घर यानी जहां संस्कार और सुधा रह रहे थे वहां पहुंच गया। वकील अंकल को अचानक देख संस्कार हैरान और परेशान।

हेमंत ने आते ही राकेश और सुनीता के बारे में पूछा।आगे पानी का गिलास देते हुए सुधा बोली, “मम्मी- पापा किसी रिश्तेदार के यहां गए हैं।”

हेमंत ने कहा, “राकेश काफी परेशान लग रहा था और उसने ही मुझे आज यहां आने को कहा।”

संस्कार : “वो आपसे बात करने के बाद भूल गए होंगे। आजकल पापा की यादाश बहुत कमजोर हो गई है। मैं आपके बारे में बता दूंगा।”

हेमंत के वहां से चले जाने के बाद संस्कार सुधा और अपने बेटे सार्थक को लेकर वृद्ध आश्रम पहुंचा। सार्थक को अपनी तरफ आते देख सुनीता अपनी ममता को रोक न पाई। और भागकर सार्थक को अपने गले से लगा लिया। संस्कार ने आगे बढ़कर अपने पिता का हाल पूछा, फिर हेमंत के आने की खबर बताई और प्रश्न भरी आँखों से अपने माता-पिता को देखने लगा। सार्थक अपने दादा-दादी से मिल, फिर आश्रम के डॉक्टर अंकल के साथ आश्रम देखने चला गया।

राकेश ने अपनी चुप्पी तोड़ी और बोला, “बेटा हेमंत अंकल को मैंने इसलिये बुलाया था, क्योंकि तुम दोनों जहाँ रह रहे हो वो घर मेरे नाम है और मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती, तुम्हारी मम्मी का मन यहां लग गया है। मेरे मरने के बाद तुम्हें कानूनी दिक्कतों का  सामना न करना पड़े इसलिए वो घर तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ।” राकेश के इतना बोलना था कि संस्कार कि आँखों से आँसू बहने लगे। संस्कार अपने पिता के पैरों में गिर गया और माफी माँगने लगा। दूर खड़ी सुधा भी फूट-फूटकर रोकने लगी और माफी माँगने लगी और  वापस घर चलने की विनती करने लगी। तभी सार्थक तूफान की तरह भागता हुआ आया
और बोला, “मम्मी-पापा आप लोग रो क्यों रहे हो? मैंने सब पता कर लिया है, डॉक्टर अंकल ने कहा है दादाजी जल्दी ठीक हो जाएंगे और यहां किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है। यहाँ सारी व्यवस्था है, सब कुछ बहुत अच्छे से व्यवस्थित है। मैंने तो मैनेजर अंकल से विजिटिंग कार्ड ले लिया है ताकि जब मैं बड़ा होगा तो आप दोनों को इतनी अच्छी जगह भेज सकूं। आप लोगों को भी यहां कोई दिक्कत नहीं होगी।”

सुधा रोती हुई सुनीता के गले लग गई और बोली, “मम्मी मुझे माफ कर दो मुझसे गलती हो गई। मैं मकान को घर समझ बैठी जब तक आप दोनों वहां नहीं होंगे, वह मकान घर नहीं बन पाएगा। आप अपने घर चलो और हम दोनों को संस्कार दो ताकि हम अपने बच्चों को संस्कार दे सके।”

सुनीता नम भरी आंखों से अपनी बहू-बेटे को दुलार का हाथ फेरी। राकेश और सुनीता दोनों अपने बच्चों को माफ कर उनके साथ चलने को तैयार हो गए।

दोस्तों ऐसे ही होते हैं माँ-बाप। हम उम्र में चाहे कितने भी बड़े क्यों न हो, लेकिन अपने माँ-बाप के लिए हमेशा छोटे ही रहते हैं। गलती कितनी भी बड़ी क्यों न हो सिर्फ सॉरी बोलने से वो हमें माफ कर देते हैं। ये बात हमेशा याद रखना, कोई अपने माँ-बाप को पाल नहीं सकता। माँ-बाप ही बच्चों को पालते हैं। घर माँ-बाप से है, नहीं तो वो चार-दीवारी है। अब तो ये आपने तय करना है आपको घर में रहना है या चार-दीवारी में।

–शालिनी

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