मन कचोंटन विमोचन
*शीर्षक,,,में गरीब ही ठीक हूँ?*
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*यारो गरीब कि जिंदगी में बस, क्या है देखिए,,,,,,,,,*
ग़रीबी उलझनों का रैन बसेरा होती है।
मगर फिर भी गरीब खुश रहता है क्यों ??
क्योंकि ना इन्हे महलों के सुख नसीब होते हैं,
ना सुदामा जैसा मित्र मिलता है ।
ना दो वक्त की रोटी ना ठिकाना है,
फिर भी अपने हाल में मस्त दीवाना हैं ।
गरीब होने का यही फायदा कि !!!
ना कोई आशा,ना कोई निराशा का भय है !!
अब चाहे गैस,पेट्रोल व सब्जी के दाम बढे,
या लैपटॉप,स्मॉर्ट फोन हो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
गरीब लोगो की जिंदगी में,
ना पेंशन है तो ना टैंशन है ।
इनकी गरीबी में अमीरी कि दावत,
तो तब आती है जब कोई इन्हें !!!
अपने बर्थडे पे पिंजा, बर्गर,फ्रूटी
मिठाई चोकलेंट दे जाता है ।
तब गरीब मुस्कुराते हुआ कभी !खाना
तो कभी रब को देखता रह जाता है ।
गरीब के सपने किताब के पन्नों की तरह बदलते हैं,
सच कहूं में अमीरों को देख गरीब ही रहना चाहता हूं ।
क्योंकि अमीर अपनी झूठी शान में जीते हैं,
वे बड़ों के अपमान की मदिरा पीते हैं ।
पैदल चलना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं,
तभी तो गरीब गरीब रहना ठीक समझता है ।
गरीब को अगर एक दिन खाना नसीब ना हो तो !!!
वो दाता तेरी मर्जी कह भूखा सो जाता है ।
जिम्मेदारियों के पीछे पूरी जिंदगी बीत जाती है,
गरीबी और भुखमरी बंदरों सी पीछे लगी रहती है।
गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए, ,,
गरीबी में से भी कुछ बचा कर रखता है ।
पैसे जेब में होने के बाद भी वह सपने ही देखता है,
क्योंकि गरीब का जीवन आज कल के छलावे में रहता है।
यारों गरीबो की जिंदगी में बस,
उलझनों का रैन बसेरा होती है ।
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* नाम शिवा सिंहल आबुरोड*
शिवा सिंहल
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