कलयुग कविता- Dr. Rishika Verma Beautiful Poem only on Muktika Publication

विषय: कलयुग

कलयुग है ये
धर्म की डोरी कमजोर है, पापों की अब भरमार है,
सत्य ढूँढने निकले जो, पथ में उनके अंधकार है।

नेता बोले मीठे बोल, भीतर लेकिन विष का जाल है,
नीति, मर्यादा, शर्म-संकोच सब यहाँ बिकते है सब दलाल है।

लोभ बना है भगवान यहाँ, माया ने सबको घेरा है।
रिश्ते-नाते छूट गए हैं, मतलब का ही अब बसेरा है।

साधु बनें हैं व्यापारी, मंदिर भी अब बाज़ार बना,
भक्ति में दिखावा ज़्यादा, खो गया है सच्चा प्यार है।

माँ-बाप बूढ़े रोते हैं, बेटों को समय नहीं साथ बिताने को,
मोबाइल में उलझा जीवन, अपनापन कहीं नहीं रहा अब।

कलयुग है ये नाम जिसका, चालाकी की चाल चले सब,
फिर भी एक उम्मीद है की सब ठीक होगा जरूर एक दिन।
डॉ. ऋषिका वर्मा
गढ़वाल उत्तराखंड

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