कलयुग कविता- Dr. Rishika Verma Beautiful Poem only on Muktika Publication

विषय: कलयुगकलयुग है ये धर्म की डोरी कमजोर है, पापों की अब भरमार है,सत्य ढूँढने निकले जो, पथ में उनके अंधकार है।नेता बोले मीठे बोल, भीतर लेकिन विष का जाल है,नीति, मर्यादा, शर्म-संकोच सब यहाँ बिकते है सब दलाल है। लोभ बना है भगवान यहाँ, माया ने सबको घेरा है। रिश्ते-नाते छूट गए हैं, मतलब … Read more