#नवांकुर_का_घोष
रात की चादर अब सिमट रही,
भोर नई मुस्काती है।
माटी की निस्तब्ध हथेली पर,
जीवन-रेखा आती है।
मैं समय के कपोलों पर,
लिखता नव विश्वास हूँ।
बीते कल की राख नहीं,
आने वाले कल की आस हूँ।
मैं ऋतुओं की देहरी पर,
नवजीवन का उल्लास हूँ।
सूनी धरती की आँखों में,
हरियाली का प्रकाश हूँ।
आँधियों! मुझको मत परखो,
मैं झुकने की रीत नहीं।
बीज हूँ, मौन सही लेकिन,
हार मानना मेरी रीत नहीं।
मैं सूखे बरगद की जड़ों में,
फिर से बहता नीर हूँ।
बुझती हुई हर आशा का,
फिर जागा विश्वास हूँ।
मैं टूटी हुई प्रार्थनाओं का,
फिर से जन्मा स्वर हूँ।
थके हुए हर पथिक के मन का,
अडिग, अटल धैर्य हूँ।
मुझमें आने वाले कल की,
अनगिन संभावनाएँ हैं।
मेरे छोटे से अस्तित्व में,
युग बदलने की कथाएँ हैं।
चलो, मिलकर बीज भरोसे के,
हर आँगन में बोते हैं।
प्रेम, श्रम और सत्य के जल से,
फ़िर नव भविष्य संजोते हैं।
स्वरचित ✍
स्वीटी श्रीवास्तव
वाराणसी, उत्तरप्रदेश







