शब्दों का ज़हर इंसान को अंदर ही अंदर खा जाता है। सामने से शायद कुछ समय बाद वह दिखाई देना बंद हो जाए, लेकिन भीतर से वही शब्द इंसान को पूरी तरह छलनी कर देते हैं। शब्दों का घाव दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका दर्द बहुत गहरा होता है।
कभी-कभी हमारे कहे हुए कुछ कड़वे शब्द अपनों को भी हमसे दूर कर देते हैं। आप लाख प्यार दिखाएँ, लाख रिश्ते को सँभालने की कोशिश करें, लेकिन पूरी ज़िंदगी में एक बार बोले गए बुरे शब्द भी किसी के दिल से आपके लिए प्यार को पूरी तरह बाहर निकाल सकते हैं।
इसलिए बोलने से पहले शब्दों को तौल लेना चाहिए, क्योंकि घाव शरीर पर हो तो समय उसे भर देता है, लेकिन शब्दों का घाव दिल पर हो तो उसकी टीस उम्रभर रह सकती है। रिश्ते प्यार से बनते हैं, विश्वास से सँवरते हैं और कभी-कभी सिर्फ़ कुछ कठोर शब्दों से हमेशा के लिए टूट जाते हैं।
याद रखिए, शब्द सिर्फ़ बोले नहीं जाते, वे किसी के दिल में उतरते हैं। इसलिए शब्द ऐसे चुनिए, जिन्हें सुनकर कोई मुस्कुराए, न कि ऐसे जिन्हें याद करके कोई जीवनभर रोए।
स्वरचित एवं मौलिक रचना
विधि सैनी








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