शब्दों का जहर​ Poison of words

दिन- बुधवार,

26 अगस्त 2026,

​विषय: शब्दों का जहर

​समाज की इस बिसात पर देखो, खेल अजब खेला जाता है,

मीठी बातों की चाशनी में, जहर लफ्जों का घोला जाता है।

अक्सर लोग भूल जाते हैं यह बात बड़ी ही नादानी से,

कि जख्म जो तन पर लगते हैं, वे भर जाते हैं आसानी से।

​मगर जो तीर जुबां से छूटकर सीधे दिल में उतर जाते हैं,

वे अपने ही पराए बनकर, अपनों को ही बिसराते हैं।

यही वह जहर है जो रिश्तों की बगिया को सुलगा देता है,

विश्वास का हरा-भरा दरख्त पल भर में जला देता है।

​कभी किसी की एक तीखी बात, मन को ऐसे भेद जाती है,

कि सदियों पुरानी प्रीति भी क्षण भर में उखाड़ जाती है।

शब्द ही तो इंसान को फर्श से अर्श पर पहुँचाते हैं,

और यही शब्द इंसान को मिट्टी में भी मिलाते हैं।

​नैनों के नीर से कभी यह दर्द नहीं धुल पाता है,

अपनों के मुँह से निकला कड़वा बोल उम्र भर चुभता है।

जहर का प्याला पीने वाला तो शायद बच भी जाता है,

मगर कड़वे वचनों का प्याला सीधा रूह को डस जाता है।

​ज़रा सोचो, किस हक से हम किसी का दिल दुखाते हैं?

चंद लम्हों के गुस्से में क्यों रिश्ता रोज मिटाते हैं?

अहंकार की इस दुनिया में जबानी खूब चलती है,

मगर अपनों के सीने पर ये कटार बनकर खलती है।

​चलो आज इस महफिल में हम सब मिलकर प्रण यह ठान लें,

कड़वी और जहरीली बातों का यह सिलसिला अब हम टाल दें।

जुबां पर अपनी थोड़ा सा तो पहरा हम बिठाएंगे,

मरहम बनकर जिएंगे जग में, कभी न जहर फैलाएंगे।

​मधुर वाणी से इस दुनिया को फिर से सुंदर बनाएंगे,

चलो मिलकर हम सब इंसानों के दिल जीत जाएंगे।

न किसी को तीर चुभाएंगे, न खुद कभी आहत होंगे,

प्यार बांटकर इस धरती पर हम सच्चे मानव कहलाएंगे।

​शायरी:

​ज़हर पीने से तो बस साँसें उखड़ती हैं यारों,

मगर ज़हरीले शब्दों से रूह तक मर जाती है!

ज़माने भर के खंजर भी वो जख्म नहीं दे पाते,

जो अपनों की जुबां से निकली बात दे जाती है!

​— लेखिका रेखा तोमर मैहर

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