आंकड़ा मोटा, कटोरी पतली (व्यंग्य)

आंकड़ा मोटा, कटोरी पतली

तिरछी नजर से
प्रभात दत्त देवेन्द्रनगर,नेहै
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
रविवार, 13 सितंबर 2026

 

रामप्रसाद के घर सुबह का हिसाब बैठ रहा था। रेडियो पर मंत्री जी का स्वर था—विकास दर सात दशमलव आठ प्रतिशत, विश्व की सबसे तेज बड़ी अर्थव्यवस्था, हेराक्यूलीयन उपलब्धि। वैश्विक हवाएं उलटी थीं, तेल नाच रहा था, फिर भी देश दौड़ गया। चूल्हे पर चीनी का डिब्बा लगभग खाली। पत्नी ने पूछा—विकास कितना हुआ? रामप्रसाद ने कहा—सात दशमलव आठ। पत्नी ने कहा—तो चीनी तो सस्ती होनी चाहिए थी। रामप्रसाद चुप रहा। चुप रहना भी अब एक आर्थिक नीति है। चुप रहो, आंकड़ा बोलने दो। आंकड़ा बोलता है स्टूडियो में। थाली स्टूडियो में नहीं बैठती। थाली चौके में बैठती है और चौका आंकड़ों की भाषा नहीं जानता। वह केवल भाव जानता है। भाव अभी मीठे नहीं हैं।

महंगाई का स्वाद और चाय का अर्थशास्त्र

चीनी बासठ रुपये किलो के आसपास पहुंच गई है। जून में सैंतालीस थी। तीन महीने में मीठे ने वह ऊंचाई छू ली जो विकास दर के भाषण में नहीं आती। साल भर में करीब उन्नीस प्रतिशत की यह दौड़ किसी स्टार्टअप से कम नहीं। अंतर केवल इतना है कि स्टार्टअप का मूल्यांकन कागज पर चढ़ता है, चीनी का मूल्यांकन चाय में उतरता है। चाय अब थोड़ी कम मीठी है। कम मीठी चाय हमारी अनौपचारिक मुद्रास्फीति नीति है।
सरकार कहती है—नियंत्रण में है। रसोई कहती है—नियंत्रण का स्वाद कड़वा है। दोनों सही हैं। झूठ तब है जब पहले वाक्य को दूसरी प्याली का प्रमाणपत्र बना दिया जाए। रामप्रसाद की पत्नी प्रमाणपत्र नहीं पढ़ती। वह चम्मच से पढ़ती है। चम्मच पुराना यंत्र है, पर झूठ नहीं बोलता।
आंकड़ा मोटा, कटोरी पतली (व्यंग्य)

आंकड़ा मोटा, कटोरी पतली: विकास की दो थालियां

कच्चा तेल एक सौ एक डॉलर के आसपास नाच रहा है। भारतीय बास्केट छह सप्ताह के शिखर पर। तेल कंपनियां पेट्रोल पर पांच रुपये लीटर और डीजल पर तेईस रुपये लीटर की चोट खा रही हैं। घरेलू गैस पर करीब दो सौ रुपये प्रति सिलेंडर की कमी। पंप पर दाम स्थिर दिखते हैं। स्थिरता का यह चमत्कार रसोई तक नहीं उतरता। सरसों का तेल अपना शिखर सम्मेलन खुद करता है।
अगस्त में रसोई गैस की बिक्री सोलह प्रतिशत घटी। कारों की बिक्री छत्तीस प्रतिशत बढ़ी। यानी सड़क पर गाड़ी बढ़ी, चूल्हे पर आंच घटी। जीएसटी दो लाख करोड़ के पार। संग्रह उत्सव मना रहा है। सिलेंडर शोक सभा। दोनों आंकड़े एक ही देश के हैं। देश अब दो थालियों में खाना खाता है—एक थाली आंकड़ों की, एक थाली अनाज की। आंकड़ों की थाली चमकदार है। अनाज की थाली पूछती है—चावल के बाद क्या?

विदेशी मुद्रा भंडार और घर का हिसाब

रुपया पचानवे के पार डॉलर से बात कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार सात सौ चालीस अरब डॉलर के कीर्तिमान पर है। कीर्तिमान तिजोरी में है। तिजोरी का कीर्तिमान रोटियों की गिनती नहीं बदलता। अप्रैल से जुलाई तक कच्चे तेल का आयात बिल साढ़े छप्पन प्रतिशत बढ़कर तिरसठ अरब डॉलर के पार चला गया।
छूट पंप पर दिखती है, थाली पर नहीं। थाली पर सरसों बोलता है, चीनी बोलती है, आटा बोलता है। ये तीनों किसी घोषणा से नहीं दबते। रामप्रसाद कहता है—देश अमीर है, घर हिसाब कर रहा है। यह वाक्य देशद्रोह नहीं, घरेलू लेखा है। घरेलू लेखा सबसे पुराना अर्थशास्त्र है। वह जीडीपी से पहले लिखा गया था, पत्थर की सिल पर, अनाज के कटोरे से।

रोजगार, त्योहार और थाली की सच्चाई

विनिर्माण का सूचकांक पांच साल के सबसे धीमे विस्तार पर है। दो वर्षों बाद पहली बार नौकरियों में कमी दर्ज हुई है। एक सर्वे में बेरोजगारी सबसे बड़ा आर्थिक चिंता का विषय है—करीब तेईस प्रतिशत लोग यही कहते हैं। महंगाई अठारह प्रतिशत जुबानों पर है। भाषण में उपलब्धि है, चौक में चिंता। फर्क इतना है कि उपलब्धि का माइक तेज है, चिंता का माइक घर के अंदर है। घर का माइक टीवी पर नहीं आता, इसीलिए लगता है कि देश एक स्वर में गा रहा है। गा रहा है स्टूडियो। घर गुनगुना रहा है—इस महीने तेल कम, चीनी कम, गैस की बारी टाल दो।
जीएसटी परिषद की बैठक बारह तारीख से हटाकर सात अक्टूबर कर दी गई। त्योहार आ रहे हैं, कर की चर्चा बाद में। त्योहार कर नहीं पूछता, भाव पूछता है। भाव पूछने वाली गृहिणी किसी परिषद से कम निर्णायक नहीं। कर कटे या न कटे, निवाला पहले कटता है। निवाला हमारी सबसे ईमानदार नीति समीक्षा है। वह बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस के फैसला सुना देता है।

पूरी कटोरी ही असली विकास दर है

यह व्यंग्य विकास पर नहीं, उस आदत पर है जो विकास को केवल प्रतिशत में पढ़ती है और कटोरी को फुटनोट मान लेती है। प्रतिशत मोटा हो सकता है, कटोरी पतली भी हो सकती है। दोनों एक साथ सच हैं। झूठ वह तस्वीर है जो मोटे प्रतिशत को मोटी रोटी बता दे। कारें बिक रही हैं, कर चढ़ रहा है, भंडार चमक रहा है—यह सब देश की ताकत है। ताकत का सम्मान करो। पर ताकत का अर्थ यह नहीं कि चूल्हा माफी मांगता रहे।
चूल्हा माफी नहीं मांगता, हिसाब मांगता है। हिसाब मांगना नागरिक धर्म है। रामप्रसाद दूसरी चाय मांगता है, चीनी डालता नहीं। कहता है—आज कड़वी ही सही, कड़वी चाय ईमानदार है। मीठी तभी बने जब चीनी ईमानदार हो, आंकड़ा नहीं। आंकड़ा तो मीठा रहेगा ही। आंकड़े की मिठास प्रयोगशाला में नहीं, प्रेस विज्ञप्ति में घुलती है। विज्ञप्ति पच जाती है। चीनी बासठ की नहीं पचती।
जब असली समृद्धि आएगी, तब रेडियो और चूल्हा एक भाषा बोलेंगे। अभी रेडियो सात दशमलव आठ गा रहा है, चूल्हा एक कटोरी कम। दोनों गाने याद रखने लायक हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहला गाना समाचार में छपेगा, दूसरा गाना थाली में उतरेगा। थाली अभी भी बड़ी प्रयोगशाला है। फैसला कड़वा होता है, पर पच जाता है। आंकड़ा मीठा लगता है, बाद में नहीं पचता। रामप्रसाद मुस्कराता है। मुस्कान उसकी मुद्रा है। मुद्रास्फीति उस पर चलती है, मुस्कान उसके पास रहती है। यही बचा है। यही काफी है, जब तक कटोरी पूरी न हो। पूरी कटोरी ही असली विकास दर है। बाकी सब दशमलव है।

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प्रभात दत्त झा

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