चारदीवारी से आज़ादी — मेरा सबसे बड़ा सपना

मेरा सबसे बड़ा सपना क्या है?

मेरी सबसे बड़ी चाहत है—अपनी आज़ादी।

चारदीवारी से आज़ादी — मेरा सबसे बड़ा सपना

इन चार दीवारों से बाहर निकलना, अपने लिए फैसले लेना, अपने सपनों को जीना और अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर देखना… मेरे लिए यही मेरी पहली प्राथमिकता है।

लेकिन चाहकर भी मैं इन चार दीवारों को तोड़ नहीं पाती।

कभी माँ की कसम देकर रोक लिया जाता है, तो कभी पिता की इज़्ज़त का हवाला दिया जाता है। जिन लोगों की इज़्ज़त और भावनाओं के नाम पर मेरी जिंदगी के फैसले किए जाते हैं, उन्हीं में से कई लोग महीनों तक यह पूछना भी जरूरी नहीं समझते कि मैं कैसी हूँ। जब बात होती है तो अक्सर एक ही सवाल होता है—
“शादी कब कर रही हो?”

और मेरा हर बार एक ही जवाब होता है—

“जब करूँगी, तो बुलाऊँगी। आप चिंता मत कीजिए।”

क्योंकि मुझे वह भीड़ पसंद नहीं, जो मेरे मुश्किल समय में मेरे साथ खड़ी न हो।

शायद इसी वजह से कुछ लोगों की नजर में मैं स्वार्थी हूँ। कुछ लोगों को मेरा व्यवहार अहंकारी लगता है, तो कुछ मुझे एटीट्यूड वाली लड़की कहते हैं।

लेकिन शायद किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर मैं ऐसी बनी क्यों।

मेरे पास इन चार दीवारों से बाहर निकलने का फिलहाल एक ही रास्ता है—किताबें।

किताबें मुझे उन तमाम नसीहतों से बचाती हैं, जो हर दिन मेरे हिस्से में आती हैं। मैं इन्हीं किताबों के सहारे अपने कमरे के एक कोने में बैठकर अपनी दुनिया बना लेती हूँ। सच कहूँ तो आज अगर मैं साँस ले पा रही हूँ, अपने सपनों के बारे में सोच पा रही हूँ और खुद को पूरी तरह हारने से बचा पा रही हूँ, तो इसमें इन किताबों का बहुत बड़ा हाथ है।

वरना मेरे अपने लोगों ने तो मुझे जाहिल और गँवार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अक्सर मुझसे पूछा जाता है—

“आखिर क्यों निकलना है तुम्हें इन चार दीवारों से?”

और मेरा जवाब बहुत सरल है—

“पढ़ना है। अपने लिए फैसले लेने हैं। अपने सपने पूरे करने हैं।”

Read More:- लड़कियों की आर्थिक आज़ादी: एक शक्तिशाली बदलाव और बेटियों की उड़ान
चारदीवारी से आज़ादी — मेरा सबसे बड़ा सपना

Read More: –1 अद्भुत सवाल: इंसान और जानवर के बीच यह गहरा भेदभाव क्यों?

मेरी जिंदगी धीरे-धीरे एक कमरे में सिमटकर रह गई है। अब तो बाहर से किताबें घर लाने पर भी बंदिशें लगने लगी हैं। लेकिन मैं भी जिद्दी हूँ।

कोई रास्ता न मिले, तो रास्ता बनाना आता है।

किताबें घर आएँगी।

जब तक मेरी साँसें चल रही हैं, मैं पढ़ती रहूँगी।

महँगी पड़ती हैं, फिर भी मैंने किताबें खुद ऑर्डर करके मँगाना शुरू कर दिया है। एक पेन तक खरीदने के लिए कभी-कभी मुझे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। पढ़ाई से मेरा ध्यान हटाने के लिए कभी रोटियों के ताने दिए जाते हैं, तो कभी यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है—

“ये बनेगी कलेक्टर!”

और मेरी माँ का एक ताना तो जैसे हमेशा मेरे साथ चलता है—

“हम भी देखेंगे, कब तक इन किताबों के सहारे जिएगी।”

कई बार मेरी किताबें फाड़ दी गईं। कभी उन्हें फेंक दिया गया। कभी हालात ऐसे बने कि उन्हें चूल्हे में जलाने तक की नौबत आ गई।

शायद किसी के लिए यह छोटी-सी बात हो।

लेकिन जिस इंसान की पूरी दुनिया किताबों में बसती हो, उसके लिए किताब का फाड़ा जाना सिर्फ कुछ पन्नों का बिखरना नहीं होता। उसके साथ उसका एक सपना भी बिखरता है।

फिर भी मैं हर बार उन बिखरे हुए पन्नों के बीच से अपने सपनों को उठा लेती हूँ।

आज जब अपने दोस्तों को देखती हूँ, तो लगता है कि सब मुझसे बहुत आगे निकल गए हैं। मुझे किसी से जलन नहीं होती। मैं बस खुद से एक सवाल करती हूँ—

“मेरी मेहनत रंग क्यों नहीं ला रही?”

इतना पढ़ने के बाद भी मैं सबसे पीछे क्यों रह गई?

यही सवाल अब हर रोज मेरे भीतर आवाज़ करता है।

सामने UPSSSC PET की परीक्षा है। चुनावी माहौल आने वाला है। हर अभ्यर्थी की अपनी उम्मीदें हैं। इस बार मैं भी चाहती हूँ कि अपने अच्छे प्रदर्शन के साथ उत्तर प्रदेश की भर्तियों की दौड़ में खुद को आगे ले जा सकूँ।

दिसंबर में UPPCS की परीक्षा भी सामने है। तैयारी कर रहे लोगों से अक्सर सुनने को मिलता है—

“बड़े एग्जाम देने वालों को छोटे एग्जाम नहीं देने चाहिए।”

लेकिन उन्हें क्या पता कि हर किसी की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होतीं।

किसी के पास किताबों की कमी नहीं होती, किसी के पास पढ़ने के लिए अलग कमरा होता है, किसी के पास आर्थिक चिंता नहीं होती और किसी के पास अपने फैसले लेने की आज़ादी।

लेकिन हर किसी की कहानी ऐसी नहीं होती।

कभी किताबों के लिए पैसे नहीं होते।

कभी एक समय का खाना छोड़कर पढ़ना पड़ता है।

और यह जरूरी नहीं कि भूख सिर्फ हॉस्टल में रहकर ही महसूस हो। कभी-कभी अपने ही घर में रहते हुए भी इंसान को अपने हिस्से की भूख, अकेलापन और संघर्ष सहना पड़ता है।

एक तरफ PCS की परीक्षा देने का उत्साह है, तो दूसरी तरफ उतना ही बड़ा डर भी।

क्या मैं अच्छा कर पाऊँगी?

कहीं मेरी तैयारी में कोई कमी तो नहीं रह जाएगी?

कहीं रिवीजन कम तो नहीं हो गया?

कहीं इतनी मेहनत के बाद फिर से मैं बीमार पड़ गई तो?

कभी-कभी इन सवालों के बीच मैं खुद को बहुत थका हुआ महसूस करती हूँ।

लेकिन फिर किताबें सामने दिखाई देती हैं।

और लगता है—

अभी सफर खत्म नहीं हुआ है।

पता नहीं यह सफर मुझे कहाँ लेकर जाएगा। पता नहीं मेरी मेहनत कब रंग लाएगी। पता नहीं वह दिन कब आएगा, जब मैं इन चार दीवारों से बाहर निकलकर अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले पाऊँगी।

लेकिन एक उम्मीद अभी भी बाकी है।

मुझे अपनी मेहनत पर भरोसा है।

शायद मेरी कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा अभी लिखा जाना बाकी है।

मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरी मेहनत एक दिन मेरे लिए वह दरवाजा खोल दे, जिसे मैं आज तक इन चार दीवारों के भीतर से देखती आई हूँ।

मेरी चारदीवारी से मेरी आज़ादी तक का यह सफर आसान नहीं है।

लेकिन मैं चल रही हूँ।

किताबों के सहारे, उम्मीद के सहारे और अपने सपनों के सहारे।

और शायद एक दिन मैं पीछे मुड़कर देखूँगी और कहूँगी—

“हाँ, मैंने कर दिखाया। मैंने अपनी जिंदगी अपने लिए चुनी।”

— विधि सैनी

3 thoughts on “चारदीवारी से आज़ादी — मेरा सबसे बड़ा सपना”

Leave a Comment