अधूरे सपनें
जीवन के लंबे सफर में कुछ यादें ऐसी होती हैं जो समय बीतने के बाद भी दिल में एक टीस बनकर जिंदा रहती हैं। इंसान दुनिया में सब कुछ भूल सकता है, लेकिन अपने अधूरे सपने कभी नहीं भूल पाता। आज की यह सच्ची दास्तान किसी फिल्मी पर्दे की कहानी नहीं, बल्कि जीवन की उस कड़वी हकीकत का आईना है जहाँ हौसले तो बहुत ऊंचे थे, पर बंदिशों और लाचारी ने सपनों की उड़ान को रोक दिया। आइए पढ़ते हैं उन अनकहे संघर्षों की दास्तान, जहाँ एक बेटी ने अपनी पढ़ाई के लिए हर मुमकिन कोशिश की, मगर अंत में अधूरे सपने ही उसकी झोली में आए।
1. 1976 का वह दौर और पढ़ाई की मजबूत लगन
बात बहुत पुरानी है, लेकिन आज भी दिल में एक कसक बनकर रह गई है। जिनके सपने अधूरे रहते हैं, उनकी जिंदगी में बस एक ही मलाल रह जाता है कि काश उस वक्त हालात थोड़े अलग होते। यह सिलसिला मेरे साथ भी हुआ।
मैंने सन 1976 में इकोनॉमिक्स विषय से अपना एम.ए. पूरा किया था। उस जमाने में लड़कियों का पोस्ट ग्रेजुएशन करना ही बड़ी बात मानी जाती थी, पर मेरे भीतर आगे बढ़ने की गहरी भूख थी। एम.ए. के बाद मेरी दिली इच्छा एल.एल.बी. (कानून की पढ़ाई) करने की थी ताकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं।
उस समय लॉ कॉलेज शाम 6:00 बजे से रात 9:00 बजे तक चलता था। मेरे भाइयों ने साफ कह दिया कि रात में कॉलेज लगता है, इसलिए लड़की का इतनी रात को बाहर रहना ठीक नहीं है। इस तरह रात के कॉलेज का हवाला देकर मुझे जाने नहीं दिया गया। मैंने भारी मन से कहा, कोई बात नहीं, अगर वकालत नहीं तो मैं बी.एड. कर लेती हूं ताकि आगे चलकर किसी स्कूल में पढ़ा सकूं।
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2. ₹5 की ट्यूशन और कड़ा व्यक्तिगत संघर्ष
बी.एड. करने के लिए नीमच से मंदसौर जाना पड़ता था। रास्ते में लगभग एक घंटे का समय लगता था। सुबह 6:30 बजे की ट्रेन चलती थी और 8:30 बजे कॉलेज का समय होता था। मेरी चार-पांच सहेलियां भी जा रही थीं, इसलिए रास्ते का कोई डर भी नहीं था, उनका पूरा साथ था।
जब मैं सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ रही थी, तभी मेरे पूज्य पिताजी शांत हो गए थे। पिता का साया उठने के बाद घर के हालात बहुत बदल चुके थे। मैंने अपनी पढ़ाई और अपने छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्च खुद उठाया। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर, दिन-रात एक करके मैंने घर को संभाला।
आपको जानकर हैरानी होगी कि मैंने मात्र ₹5 प्रति महीने की फीस से बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया था। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और वह फीस ₹40 तक पहुंची। इसके अलावा थोड़ा बहुत स्वेटर बुनने का काम और हैंडीक्राफ्ट की छोटी-मोटी कलाकृतियां बनाकर मैं अपनी पढ़ाई का खर्च निकालती थी।
लेकिन जब बी.एड. के एडमिशन का समय आया, तो भाइयों ने साफ आर्थिक मदद देने से मना कर दिया। उस समय कुल मिलाकर बस ₹1,500 की जरूरत थी, जिसमें ट्रेन का पास और कॉलेज की पूरी फीस आराम से हो जाती थी।
3. रिश्तों की बेरुखी और ₹1500 की बेबसी
जब घर से कोई रास्ता नहीं दिखा, तो मैंने उम्मीद भरी नजरों से अपने ताऊ जी से मदद मांगी। उन्होंने दो टूक सवाल किया, “तुझे पैसे तो दे दूंगा, पर तू इसे चुकाएगी कैसे?”
मैंने बहुत भरोसे के साथ कहा, “ताऊ जी, मैं ट्यूशन पढ़ाकर आपके पूरे पैसे चुका दूंगी।”
उन्होंने फिर अविश्वास जताते हुए कहा, “अगर इस बीच तेरी शादी हो गई, तो मेरे पैसों की जिम्मेदारी कौन लेगा?”
मैंने हाथ जोड़कर कहा, “मैं ससुराल जाकर वहां से आपका पैसा लौटा दूंगी।”
उनका अगला सवाल था, “अगर तेरे ससुराल वालों ने देने से मना कर दिया तब?”
मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “ताऊ जी, सिर्फ पंद्रह सौ रुपये की बात है, मुझ पर थोड़ा भरोसा रखिए। मैं मंदसौर से दो घंटे लेट वाली रात 8:00 बजे की ट्रेन पकड़ लूंगी। उन दो घंटों में मंदसौर में ही किसी बच्चे को ट्यूशन पढ़ा लूंगी, लेकिन आपकी पाई-पाई बी.एड. पूरा होने से पहले चुका दूंगी।”
इतना विश्वास दिलाने और मिन्नतें करने के बाद भी ताऊ जी का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने पैसे देने से इनकार कर दिया और मैं बी.एड. में दाखिला नहीं ले पाई। उस दिन मेरा दिल भीतर से चकनाचूर हो गया था। मैं अकेले में बहुत रोई कि एक इंसान पढ़ने की चाहत रखकर भी इतना बेबस और लाचार कैसे हो सकता है।
4. ससुराल की चौखट और आखिरी उम्मीद का टूटना
शादी के बाद जब मैं ससुराल पहुंची, तो मन में फिर से उम्मीद की एक किरण जगी। मैंने हिम्मत जुटाकर अपने ससुर जी से कहा कि मैं पढ़ना चाहती थी, मुझे बी.एड. और एल.एल.बी. करनी थी पर मायके में परिस्थितियां ऐसी बनीं कि मैं कर नहीं पाई।
मेरी बात सुनकर ससुर जी बहुत खुश हुए और उन्होंने मुझे एल.एल.बी. करवाने का पक्का वादा भी कर दिया। लगा कि शायद अब मेरे जीवन की रात ढलने वाली है, लेकिन यहां भी किस्मत ने मुंह मोड़ लिया।
मेरी सास बीच में आ गईं और उन्होंने पढ़ाई का सख्त विरोध किया। वे तंज कसते हुए बोलीं, “इसके बाप को बोल दो कि घर पर दो-चार नौकर लगा देगा, फिर यह बी.एड. करे या कहीं भी जाए। घर का चूल्हा-चौका कौन संभालेगा, क्या इसकी मां करेगी?”
वे कड़वे बोल सुनकर एक पल के लिए दिल की धड़कनें ठहर गईं। आँखों से बेबसी के आँसू बह निकले। उस दिन मैंने हमेशा-हमेशा के लिए आगे पढ़ने की उम्मीद ही छोड़ दी।
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5. अनकही कसक और जीवन का सच
किसी ने सच ही कहा है कि किस्मत के फैसलों के आगे इंसान की मर्जी नहीं चलती। हम जिंदगी भर अपने अधूरे सपने पूरे करने के लिए हाथ-पैर मारते हैं, लेकिन सामाजिक बेड़ियों और लाचारी के चलते खाली हाथ रह जाते हैं।
मेरे ऐसे कई अधूरे सपने हैं जिन्हें अगर आज मैं गिनने बैठूं तो शब्द कम पड़ जाएंगे। पूरी जिंदगी इन्हीं कसकों को सहते-सहते ढलान पर आ गई, पर उन सपनों को कभी हकीकत का रूप नहीं दे पाई।
अंत में ईश्वर से बस यही एक करबद्ध प्रार्थना है कि जिंदगी में किसी भी मोड़ पर किसी इंसान को इतना लाचार और मजबूर मत करना कि उसके जीते-जी उसके अधूरे सपने उसकी आँखों के सामने दम तोड़ दें।
— शिवा सिंहल, आबुरोड
शिवा सिंहल
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