बौना शैतान: खूनी बत्तीसी
रामगढ़ की पहाड़ियों के बीच बनी वह पुरानी हवेली सालों से सुनसान पड़ी थी। गाँव के लोग कहते थे कि उस हवेली की कालकोठरी में एक ऐसा खौफ छुपा है, जिसकी मुस्कान ही मौत का पैगाम लाती है।
विकास, जो एक निडर लेखक था, इस अफ़वाह का सच जानने के लिए उस हवेली में पहुँचा। जब वह हवेली के नीचे बनी सीलन भरी कालकोठरी में उतरा, तो वहाँ चारों तरफ इंसानी कंकाल और खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं। हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था।
तभी, कोने में बने एक संकरे आले से लोहे की जंजीरों के खड़कने की आवाज़ आई। विकास ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस तरफ घुमाई।
रोशनी पड़ते ही विकास के कदम वहीं जम गए। सामने एक बौना, बिना बालों वाला विकृत जीव बैठा था। उसका शरीर तो इंसान जैसा सूखा हुआ था, लेकिन उसकी बांहें पूरी तरह से सिर्फ कंकाल की हड्डियों का ढांचा थीं। उसके चेहरे पर एक बेहद चौड़ी, डरावनी और अस्वाभाविक मुस्कान थी—दांतों से भरी एक खूनी बत्तीसी, जो किसी आम इंसान की नहीं हो सकती थी।
वह बौना शैतान धीरे-धीरे घिसटते हुए विकास की तरफ बढ़ा। उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी, सिर्फ दो बड़े-बड़े सफेद गोले थे। उसने अपने कंकाली पंजों में ढेरों इंसानी आँखें थाम रखी थीं।
“तुम्हारी आँखें बहुत सुंदर हैं…” वह अपनी भयानक खूनी बत्तीसी दिखाते हुए एक भारी और फटी हुई आवाज़ में फुसफुसाया। “इन्हें मेरी इस माला में जुड़ना ही होगा!”
उसने अपनी कंकाली उंगली से विकास की तरफ इशारा किया। विकास भागने के लिए पलटा, लेकिन तभी दीवार पर एक विशाल, दानवी साया उभर आया और दरवाजे का रास्ता बंद हो गया। उस बौने शैतान का अट्टहास पूरी कालकोठरी में गूंजने लगा। उसकी वह खूनी बत्तीसी अँधेरे में चमक रही थी, और विकास समझ गया कि रामगढ़ का यह खौफ कोई कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी और भयानक सच्चाई था।
– लेखिका रेखा तोमर मैहर








