वक्त की दहलीज पर Part 1
रात के ग्यारह बज चुके थे। चारों तरफ गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, बस रह-रहकर खिड़की से टकराती हुई ठंडी हवा की सरसराहट उस खामोशी को तोड़ रही थी। कमरे में जलती हुई एक छोटी सी मेज-बत्ती की मद्धम रोशनी पूरे कमरे को एक रहस्यमयी माहौल दे रही थी। टेबल पर बिखरे हुए कागजात, एक पुरानी डायरी और हाथ में थमी फाउंटेन पेन… यह सब इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज की रात भी सोने के लिए नहीं, बल्कि किसी अनदेखे राज को पन्नों पर उतारने के लिए है।
अवनि ने गहरा सांस लिया और अपनी पुरानी डायरी का पन्ना पलटा। वह एक साधारण पत्रकार थी, लेकिन सच को तलाशने की उसकी जिद उसे अक्सर आम रास्तों से अलग ले आती थी। आज जिस मामले की फाइल उसके हाथों में थी, वह शहर के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित घराने, ‘रायजादा परिवार’ से जुड़ा हुआ था।
तीन दिन पहले, रायजादा मेंशन के सबसे पुराने और वीरान हिस्से में एक पुरानी तिजोरी मिली थी। किसी को नहीं पता था कि उस तिजोरी में क्या है। जब उसे खोला गया, तो उसमें से न सोने-चांदी के जेवर मिले और न ही संपत्ति के दस्तावेज। उसमें से मिली तो सिर्फ एक चमड़े की बाइंडिंग वाली पुरानी डायरी, जिस पर लाल स्याही से लिखा था—”वक्त की दहलीज पर ठहरे हुए राज।”
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अवनि को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह इस डायरी की सच्चाई की पड़ताल करे। शुरुआत में उसे लगा कि यह किसी पुराने लेखक की काल्पनिक कहानी होगी, लेकिन जैसे-जैसे उसने पन्ने पढ़ने शुरू किए, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। डायरी में लिखी हर घटना पचास साल पुरानी रायजादा हवेली की वास्तविक घटनाओं से मेल खा रही थी, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि डायरी की लिखावट बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी अवनि की अपनी लिखावट थी!
”यह कैसे संभव है?” अवनि ने खुद से सवाल किया। उसके हाथों में हल्की सी ककंपकंपी छूटने लगी। उसने पन्ना आगे पलटा।
डायरी में लिखा था:
”अगर कोई इस डायरी को आज से पचास साल बाद पढ़ रहा है, तो समझ लेना कि वक्त का पहिया घूम चुका है। जो अधूरा रह गया था, उसे पूरा करने का समय आ गया है। हवेली के पिछवाड़े बना वह पुराना कुआं सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, वह रायजादा परिवार के उस सबसे बड़े सच का गवाह है, जिसे हमेशा के लिए दफना दिया गया था।”
अवनि की धड़कनें तेज हो गईं। उसने तुरंत अपना कैमरा, टॉर्च और एक छोटा सा नोटबुक अपने बैग में रखा। दिल में अजीब सा खौफ था, लेकिन सच को जानने की लालसा उस डर पर भारी पड़ रही थी। उसने अपनी कार की चाबी उठाई और रायजादा मेंशन की तरफ निकल पड़ी।
रात के बारह बज रहे थे जब अवनि की कार रायजादा हवेली के लोहे के विशाल दरवाजे के सामने रुकी। जंग लगे हुए भारी दरवाजे पर चांद की हल्की रोशनी पड़ रही थी। हवेली बाहर से बिल्कुल सुनसान और डरावनी लग रही थी। अवनि कार से उतरी और दबे पांव हवेली के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ने लगी।
झाड़ियों और घने पेड़ों को पार करते हुए, वह उस पुराने कुएं के पास पहुंची, जिसका जिक्र डायरी में किया गया था। कुआं बहुत पुराना था और उसके चारों ओर काई जमी हुई थी। अवनि ने अपनी टॉर्च की रोशनी कुएं के अंदर डाली, लेकिन गहराई इतनी थी कि सिर्फ अंधेरा ही नजर आ रहा था।
तभी, अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे कोई खड़ा है। एक हल्की सी आहट, जैसे सूखे पत्तों पर कोई धीरे-धीरे चल रहा हो।
अवनि की सांसें थम गईं। उसने धीरे से पीछे मुड़कर अपनी टॉर्च की रोशनी उस तरफ घुमाई।
वहां कोई नहीं था… सिर्फ हवा की सरसराहट थी। लेकिन जब उसने वापस कुएं की तरफ रुख किया, तो उसकी नजर कुएं के किनारे बने पत्थर पर पड़ी। वहां एक ताजा लाल रंग का गुलाब रखा हुआ था, और उसके नीचे एक कागज का टुकड़ा दबा हुआ था।
अवनि ने डरते-डरते उस कागज के टुकड़े को उठाया। उस पर लिखा था:
“अवनि, वापस लौट जाओ। कुछ राज ऐसे होते हैं जो अगर उजागर हो जाएं, तो सिर्फ सच नहीं बदलता… पूरी जिंदगी बदल जाती है।”
अवनि स्तब्ध रह गई। इस सुनसान हवेली में, इस आधी रात को, उसका नाम जानने वाला कौन हो सकता था? और डायरी का उस रहस्यमयी लिखावट से क्या संबंध था?
अवनि को समझ आ गया था कि यह सिर्फ एक पुरानी डायरी या केस की पड़ताल नहीं है, बल्कि उसकी अपनी पहचान और अतीत का वह धागा है, जो इस हवेली की दीवारों से जुड़ा हुआ था। उसने तय कर लिया था कि वह बिना सच जाने पीछे नहीं हटेगी, चाहे इसके लिए उसे वक्त की किसी भी दहलीज को पार क्यों न करना पड़े।
(क्रमशः… अगले भाग में जारी)
— लेखिका रेखा तोमर
दिनांक: 15 अक्टूबर 2026
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