कुंदन राज दत्ता "निश्छल" (Superstar Writer)
सपनों की उड़ान
छोटा-सा सपना आँखों में पलता रहा,
हर मुश्किल के आगे दिल चलता रहा।
कभी धूप मिली, कभी छाँव मिली,
फिर भी उम्मीद की एक राह मिली।
लोगों ने कहा, “ये आसान नहीं,”
दिल ने कहा, “कोशिश बेकार नहीं।”
गिरा तो कई बार, मगर उठ गया,
थोड़ा टूटा, फिर भी जुट गया।
जेब में पैसे कम थे, हौसला बड़ा,
मुश्किलों ने हर मोड़ पर मुझे घेरा।
कभी अपनों ने भी समझाया बहुत,
पर दिल ने कहा—“रुकना नहीं, बस चलते रह।”
रास्ते में काँटे भी मिलते रहे,
कुछ अपने भी मुझसे छूटते रहे।
फिर भी आँखों में सपना रहा,
दिल में जीत का अपना भरोसा रहा।
कभी रात ने डराया, कभी दिन ने थकाया,
कभी वक्त ने भी खूब मुझे आजमाया।
मगर मेरी चाहत कहाँ कम हुई,
हर ठोकर के बाद नई हिम्मत हुई।
मैंने आसमान को छूने की ठानी,
भले ही छोटी थी मेरी कहानी।
पंख नहीं थे, फिर भी उड़ता रहा,
अपने सपनों के पीछे चलता रहा।
मंजिल मिलेगी, ये यकीन है मुझे,
आज नहीं तो कल, ये उम्मीद है मुझे।
सपने वो नहीं जो नींद में आएँ,
सपने वो हैं जो जीना सिखाएँ।
बस इतना ही अरमान दिल में रहे,
मेरे सपनों की उड़ान यूँ ही चलती रहे।
थक जाऊँ अगर तो थोड़ा ठहर जाऊँ,
मगर हार मानकर कभी न लौट पाऊँ।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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