प्रेम
तू ही जीवन
बेसाख्ता फूट पड़ता है नाम तेरा अब
जब भी किसी और को आवाज़ लगाता हूं
जो नाम छुपाना चाहता हूं दुनियाभर से
खुद ही चिल्ला चिल्ला कर बतलाता हूं
अब हर शख़्स में अक्स दिखता है तुम्हारा
न जाने किस किस को देख मैं मुस्कुराता हूं
एक झलक बस एक झलक पाने भर को
तेरे आने की राह पर नज़रें टिकाए बैठ जाता हूं
नशा सा छा जाता है तेरा ज़िक्र होने भर से
मैं तुम से अनजान हूं मैं सबको ये जतलाता हूं
दिन में तुम रात में तुम चारों ओर तुम ही तुम हो
आँख खुली हो या बंद तेरी ही झलक पाता हूं
तू अनजान नहीं दीवानगी से मेरे तू जतलाता नहीं
मैं हर भाव अपने दिल का तुमको बतलाता हूं
सोना जागना खाना पीना ये सब ही तो जिंदगी नहीं
कोई पूछे क्या है जीवन मैं तेरा नाम बतलाता हूं
रवि गौतम “अनादि”








