माँ का संदूक
15-10 -2026
माँ की संदूक
मेरी माँ के पास एक संदूक था। जो काफी पुराना था शायद उनकी शादी का। क्योंकि उनके समय में आज की तरह एयर बैग नहीं होते थे। लोगों के पास समान रखने के लिए संदूक ही हुआ करते थे। शादी में भी दुल्हन के साथ संदूक ही आया करता था। वही संदूक जिन्दगी भर स्त्री का समान रखने की जगह होती थी।
हमारा बचपन और संदूक
माँ का वह संदूक जीवन भर मेरी ओर मेरे भाई की जिज्ञासा का विषय बना रहा। जब हम बच्चे थे तब कभी घरवालों से कुछ खाने के लिए पैसे माँगते थे तो, घर के बाकी सदस्य जैसे बुआ, दादी वगैरह हमसे कहते… जाओ अपनी माँ से माँगों उसके पास बहुत पैसे हैं संदूक भरके।। हम भी नादान बच्चे थे। माँ के पीछे पड़ जाते थे पैसे देने के लिए। हमने कभी ये नहीं सोचा कि माँ के पास पैसे कहाँ से आयेंगे क्योंकि माँ नौकरी तो करती नहीं थी। पूरा दिन घरवालों के सेवा ही करती रहती थी। पापा भी अपनी नौकरी से जो पैसे हर महिने भेजते उसका मनीआर्डर दादा जी के पास आता था। उनका भी सोचना था कि बहू को खाना मिल जाता है और पहनने के लिए कपड़े मिल जाते हैं तो उसे पैसों की क्या जरूरत उसे कहीं जाना तो है नहीं।
माँ कभी अपने मायके यानी नाना जी के घर जाती तो दादाजी टिकट और मिठाई ले जाने के पैसे गिन कर दे देते थे । माँ जब नानाजी के घर से वापस आती तब शायद उनके पास कुछ पैसे होते थे। तब माँगने वह हमें एक – दो बार पैसे जरूर दे देती थी।
इसलिए हम हमेशा सोचते कि जरूर माँ के पास पैसे हैं वह हमें देती नहीं है। बच्चे थे ना नासमझ। वक्त बितता गया। घर के बाकी सदस्य हमेशा अभी भी यही कहते थे कि तुम्हारी माँ के पास पैसे हैं।
पापा का जाना
मैंने कॉलेज जाना शुरू ही किया था कि पापा की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। माँ की तो सारी दुनिया ही उजड़ गयी। पापा प्रायवेट कम्पनी में नौकरी करते थे तो पेंशन का तो सवाल ही नहीं उठता था। हाँ कुछ पैसे कम्पनी की ओर से अवश्य मिले जिसे दादाजी ने ये बोलकर बैंक में फिक्स डिपॉजिट कर दिया कि ये मेरी शादी में काम आयेंगे।
पापा के जाने के बाद माँ काफी कमजोर हो गयी थी। पूरा दिन काम ही करती रहती। फिर भी दादी बीच – बीच में ताना मारना नन्ही भूलती ऊपर से रही सही कसर बुआ लोग आकर पूरा कर देते थे। तब हमें भी इतनी अक्ल नहीं थी कि माँ के साथ रहें। हम बाकी घरवालों के साथ ही रहते थे। माँ के पास कम ही जाते थे।
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कपडों की खुशबु
उन्हीं दिनों मैंने एक दिन माँ को संदूक खोलते हुए देख लिया था तो मैं जल्दी से उनके पास पहुँच गयी और देखने की जिद करने लगी। पर माँ ने नहीं दिखाया। और जल्दी से संदूक बंद कर दिया। उसी जल्दीबाजी में पापा की एक कमीज बाहर ही रह गयी। वो भी पुरानी। मैंने माँ से पूछा.. आपने पापा की ये इतनी पुरानी कमीज अपने संदूक में क्यूँ सँभाल कर रखी है। तो माँ ने इतना ही कहा…. “इससे तेरे पापा की खुशबु आती है।”
उस समय तो मैं कुछ समझ नहीं पायी पर आज जब भी उस बात को याद करती हूँ तो आँसू अपने आप निकल आते हैं माँ का दर्द जानकर। उन्होंने अपना दर्द कभी किसी से कहा ही नहीं बस चुपचाप अपना काम करती रही।
मेरी शादी हो गयी। और कुछ साल बाद भाई की भी शादी हो गयी। पिछले साल माँ भी हमें छोड़कर चली गयी। तेरहवीं के बाद सभी लोग कहने लगे कि अपनी माँ का बक्सा खोलो देखें तो सही क्या छोड़कर गयी है तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए।
अब तक हम इतने बड़े तो हो ही गए थे कि माँ की स्थिति को समझ सकते थे। हम दोनों भाई – बहन उस संदूक को अकेले में खोलना चाहते थे। पर सबकी जिद के कारण हमें उसे सबके सामने खोलना पड़ा।
संदूक खोलते ही उसमें से सबसे ऊपर पापा की वही कमीज थी जो मैंने पहले देखी थी। फिर पापा की वह पेंट थी जिसमें उनका एक्सीडेंट हुआ था। फिर उसके नीचे मेरे और मेरे भाई के बचपन के कपड़े थे जब हम बहुत छोटे रहे होंगे एक साल या उससे भी कम के । और सबसे नीचे एक लाल रंग की साड़ी थी जो शायद उनकी शादी की साड़ी थी।
ये खजाना निकला था हमारी माँ के संदूक से। जिसे देखकर बाकी लोग नाक भौं सिकोड़ने लगे। पर हम दोनों भाई – बहनों के लिए वह किसी बहुमूल्य खजाने से कम नहीं थी क्योंकि उस सब में हमें हमारी माँ की यादें और उनकी खुशबु महसूस हो रही थी।
हम दोनों ने उस खजाने को बराबर बाँट लिया और अपने पास रख लिया। आज भी जब माँ की याद आती है तो उसी खजाने को खोलकर अपने सीने से लगा लेते हैं तो हमें माँ का एहसास होने लगता है। यही हमारा सबसे बड़ा खजाना है। क्योंकि हमें पैसों से मजबूत तो माँ ने उसी दिन बना दिया था जिस दिन उन्होंने हमें पड़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया था। धन्यवाद 🙏
भावना भट्ट
स्वरचित और मौलिक रचना
आपको मेरी रचना कैसी लगी समीक्षा देकर जरूर बताईयेगा। और आगे मुझे पढ़ने के लिए फालो कीजिएगा और प्रोत्साहन दीजियेगा धन्यावाद 🙏
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Agar Bhawana Bhatt ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









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