Abhi is lekh ko 84 log padh rahe hain

हो महर

हो महर बहे खिलौनों से मकान, और सभी शहर नहीं दिया कोई अवसर, कैसा ये कहर? गुमान हो किस बात का, तुझे, ऐ ज़िंदगी, वजूद पल में मिट गया, यूँ आई एक लहर सड़क हज़ारों मिट गईं, इंसानों की बनी, बची हुई है सिर्फ़ एक तबाही की डगर हुकूमतें ना चल सकी किसी भी धर्म … Read more