प्रकृति के चमत्कार
जब सृष्टि ने अपने प्रथम स्वप्न का उन्मीलन किया,।।
( मेरी कविता में उन्मीलन शब्द का अर्थ ….. जब सृष्टि ने अपने पहले स्वप्न को अभिव्यक्त किया )
तभी प्रकृति ने अपने हरित करों से
धरा के मस्तक पर जीवन का तिलक अंकित किया।
उषा की अरुणिमा जब
क्षितिज के अधरों पर मुस्कान धरती है,
तब प्रत्येक ओस-कण
मानो सूर्य का लघु प्रतिरूप बन
अस्तित्व का अभिनंदन करता है।
पर्वत केवल शिलाओं का संचय नहीं,
वे कालजयी धैर्य के महामंत्र हैं;
नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं,
वे करुणा की अखंड प्रवहमान ऋचाएँ हैं।
वन की निस्तब्धता में
अनहद निनाद का आलोक छिपा है,
पवन के प्रत्येक स्पंदन में
ईश्वर का अप्रकट आलिंगन स्पंदित होता है।
इंद्रधनुष जब नभ पर
सप्तवर्णी स्वप्न उकेरता है,
तब प्रतीत होता है—
मानो स्वयं विधाता ने
आकाश पर आशा का महाकाव्य लिख दिया हो।
पुष्पों की सुरभि,
भ्रमरों का गुंजन,
कोयल का मधुर आलाप,
मयूर का वर्षा-विलास—
ये सब प्रकृति के मौन श्लोक हैं,
जिन्हें केवल संवेदनशील हृदय ही पढ़ पाता है।
बीज का वटवृक्ष बन जाना,
निर्जीव प्रतीत होती मिट्टी से
अनगिनत जीवनों का प्रस्फुटित हो उठना,
शिशिर के पश्चात पुनः वसंत का लौट आना—
क्या ये किसी चमत्कार से कम हैं?
चंद्रमा की शीतल चाँदनी
जब थके हुए जगत पर अमृत बरसाती है,
तब प्रतीत होता है कि
प्रकृति केवल दृश्य नहीं,
दिव्यता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार है।
हे मानव!
यदि चमत्कारों की खोज में
तू दूर-दूर तक भटक रहा है,
तो एक बार
मौन होकर किसी नदी के तट बैठ,
किसी वृक्ष की छाया में श्वास ले,
किसी पुष्प की सुगंध को आत्मा में उतरने दे।
तुझे ज्ञात होगा—
सबसे महान चमत्कार
आकाश में नहीं,
धरती पर नहीं,
अपितु उस चेतना में है
जो प्रकृति के प्रत्येक कण में
परमात्मा का स्पर्श अनुभव कर लेती है।
प्रकृति का प्रत्येक क्षण एक वेद है,
प्रत्येक ऋतु एक उपनिषद्,
प्रत्येक पुष्प एक प्रार्थना,
और प्रत्येक प्राण…..
सृष्टिकर्ता के अनंत प्रेम का
अविनाशी चमत्कार।
********* स्वरचित कविता
दीपा सिंह गौतम
गंजबासौदा मध्य प्रदेश से





