“ग़ज़ल रेखा की”

दिन: मंगलवार

दिनांक: 18 अगस्त 2026

विषय: विश्वासघात (ग़ज़ल)

​दिल पे अपनों का ही अबकी बार गहरा वार हुआ,

काँच सा नाज़ुक भरोसा आज तार-तार हुआ।

​जिसको माना था सदा ही हमने अपनी ज़िंदगी,

आज उसी के हाथों से ही ये विश्वासघात हुआ।

​गैरों के छलावे का तो कोई मलाल ही न था,

हमको तो अपनों की ही नीयत से मलाल हुआ।

​हर हँसी के पीछे छुपा था ज़हर छल-फ़रेब का,

मासूमियत का ये मज़ाक सरेबाज़ार हुआ।

​जिस दरख़्त के साए में हमने राहत ढूँढी थी,

उसकी ही हर शाख से अब नफ़रतों का वार हुआ।

​सच कहा है किसी ने कि धोखा पराए कहाँ देते,

जानने वालों से ही दिल का सौदा हर बार हुआ।

​आँख मूँदकर जो किया था एतबार हमने कभी,

आज उसी एतबार का ही कत्ल ज़ार-ज़ार हुआ।

​ज़िंदगी ने एक कड़वा ये सबक सिखा दिया,

जहाँ में सीधेपन का ही सबसे बड़ा नुकसान हुआ।

​अब न करेंगे किसी के झूठे वादों पर यकीं,

ज़ख्म खाने के बाद ही तो दिल ये होशियार हुआ।

​— लेखिका रेखा तोमर मैहर

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