Sweety srivastava (Champion)
जब स्त्री सवाल करने लगती है…
कभी आपने गौर किया है?
एक स्त्री जब तक सब कुछ चुपचाप सहती रहती है, उसे समझदार कहा जाता है।
जब तक वह अपनी इच्छाएँ पीछे रखती है, उसे संस्कारी कहा जाता है।
जब तक वह हर बात पर “ठीक है” कहती है, वह अच्छी स्त्री होती है।
लेकिन जिस दिन वह पूछ लेती है—**“क्यों?”**
उसी दिन उसके स्वभाव पर सवाल उठने लगते हैं।
“तुम इतना सवाल क्यों करती हो?”
“हर बात को इतना सोचने की क्या जरूरत है?”
“घर में रहना है तो थोड़ा समझौता करना ही पड़ता है।”
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मैं अक्सर सोचती हूँ—आखिर स्त्री के सवाल इतने असहज क्यों कर देते हैं?
क्या इसलिए कि सवाल करने वाली स्त्री को सिर्फ आदेश देकर चुप नहीं कराया जा सकता?
या इसलिए कि वह धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को पहचानने लगती है?
शायद दोनों।
मैंने भी जीवन में कई बार पाया कि चुप रह जाना आसान होता है। अपनी बात कहने से कहीं ज्यादा आसान। क्योंकि अपनी बात कहने के बाद सिर्फ शब्द नहीं निकलते, उनके साथ कई आशंकाएँ भी सामने आती हैं—किसे बुरा लगेगा, कौन नाराज़ होगा, कौन गलत समझेगा और कहीं रिश्ते प्रभावित तो नहीं होंगे?
इसलिए हममें से बहुत-सी स्त्रियाँ अपनी बात अपने ही भीतर रख लेती हैं।
सुबह घर के कामों के बीच कोई इच्छा मन में आती है और शाम तक वह इच्छा कहीं पीछे छूट जाती है।
किसी बात से मन दुखता है, लेकिन हम कह देते हैं—“कोई बात नहीं।”
किसी निर्णय से असहमति होती है, फिर भी कह देते हैं—“जैसा आप ठीक समझें।”
धीरे-धीरे “कोई बात नहीं” कहते-कहते हम अपने मन की बहुत-सी बातें सुनना ही बंद कर देते हैं।
लेकिन एक समय आता है, जब भीतर की आवाज़ बहुत धीमे से पूछती है—
**“और मैं?”**
यही शायद वह क्षण होता है, जब स्त्री अपने भीतर लौटना शुरू करती है।
मेरे लिए भी यह समझ धीरे-धीरे आई कि अपनी बात रखना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। अपनी पसंद बताना स्वार्थ नहीं है। अपने अधिकार जानना अहंकार नहीं है।
और सवाल करना भी विद्रोह नहीं है।
सवाल तो संवाद का रास्ता खोल सकते हैं।
हाँ, हर सवाल का जवाब हमारी इच्छा के अनुसार मिले, यह जरूरी नहीं। हर बात मनवाना भी जरूरी नहीं। लेकिन अपनी बात कह पाने का अधिकार तो होना ही चाहिए।
मुझे लगता है, स्त्री को हमेशा दो रास्तों के बीच क्यों रखा जाता है—या तो वह पूरी तरह सहनशील हो, या फिर उसे “जिद्दी” कह दिया जाए?
क्या वह बीच का रास्ता नहीं चुन सकती?
क्या वह रिश्तों को महत्व देते हुए भी अपने आत्मसम्मान को बचाकर नहीं चल सकती?
क्या वह परिवार से प्रेम करते हुए अपने सपनों से भी प्रेम नहीं कर सकती?
मैं अब मानती हूँ कि स्त्री को किसी के खिलाफ खड़े होने की जरूरत नहीं।
उसे बस **अपने भीतर खड़े होने की जरूरत है।**
जहाँ प्रेम है, वहाँ प्रेम रहे।
जहाँ जिम्मेदारी है, वहाँ जिम्मेदारी निभे।
जहाँ समझौता जरूरी है, वहाँ समझौता भी हो।
लेकिन हर बार सिर्फ इसलिए पीछे हट जाना कि “मैं स्त्री हूँ”—यह जरूरी नहीं।
क्योंकि स्त्री केवल रिश्तों की पहचान नहीं है।
वह स्वयं भी एक पूरा व्यक्तित्व है—उसके अपने विचार हैं, सपने हैं, पसंद-नापसंद हैं, प्रश्न हैं और एक ऐसा मन है जिसे समझे जाने की उतनी ही जरूरत है, जितनी वह दूसरों को समझने की कोशिश करती है।
आज भी मेरे भीतर सवाल उठते हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैं अपने सवालों से डरती नहीं।
क्योंकि मैंने जाना है—
**हर सवाल किसी रिश्ते के विरुद्ध नहीं होता,
कुछ सवाल अपने अस्तित्व के पक्ष में भी होते हैं।**
और शायद जिस दिन एक स्त्री अपने भीतर उठती उस छोटी-सी आवाज़ को सुन लेती है, उसी दिन वह किसी और से नहीं, **सबसे पहले स्वयं से मिलती है।**
❝© स्वीटी❞
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Agar Sweety srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








