फ़िर भी बचा रह जाता है ।
यह कैसा, प्रेम का नाता है?
कितनी भी ,अनबन हो चाहे ।
यह पुनः ,लौट कर आता है।
जितना बचना ,चाहें इससे ।
यह उतना, बढ़ता जाता है।
हटाकर घृणा, को यह पुनः।
अपना स्थान, बनाता है ।
सबकी चालों, को सहकर भी।
यह हर क्षण , बढ़ता जाता है।
सारे द्वेषों के ऊपर यह ,
विजय सदैव ही पाता है।
यह कैसा,प्रेम का नाता है?
pragati dutt
Whatsapp Number : usp_whatsapp : 07055145050