माटी के वे अमर सपूत

माटी के वे अमर सपूत

इस माटी ने जनमे हैं, अग्नि-शिखा से वीर,

जिनके रक्त से लिखी गई, भारत की तकदीर।

माथे पर तिरंगा, हृदय में मातृ-गान,

मृत्यु सामने खड़ी रही, फिर भी अडिग रहे प्राण।

सीमा की बर्फीली रातों में, वे दीपक बन जलते हैं,

आँधी हो या तूफ़ान, पर्वत-से अटल रहते हैं।

रणभूमि की धूल भी जिनके चरण चूमती है,

उनकी वीरगाथा सुनकर, धरती स्वयं झूमती है।

माँ की आँखों के आँसू को, विजय-तिलक मान लिया,

माटी की रक्षा के लिए, अपना सर्वस्व दान किया।

उनकी शहादत से आज़ादी का सूरज दमक रहा,

हर भारतवासी के भीतर उनका साहस धड़क रहा।

वे केवल इतिहास नहीं—जीवित संस्कार हैं,

भारत के मस्तक पर अंकित अमिट विचार हैं।

जब तक गगन में सूरज और धरा में प्राण रहेंगे,

भारत के ये वीर सपूत सदा अमर रहेंगे।

नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)

कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)

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