जब तमन्नाएँ थम जाएँ, तभी भीतर का सूर्योदय होता है
जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि मनुष्य मर जाता है; सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह जीते-जी अपनी इच्छाओं का कैदी बना रहता है। वह एक इच्छा पूरी करता है, तभी दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। उपलब्धियाँ बढ़ती हैं, सुविधाएँ बढ़ती हैं, लेकिन भीतर का सुकून अक्सर घटता चला जाता है। ऐसे समय में यह विचार गहरी चेतना जगाता है—”जब साँसें समाप्त हो जाएँ और तमन्नाएँ शेष रह जाएँ, वह मृत्यु है। जब साँसें शेष हों, पर तमन्नाएँ समाप्त हो जाएँ, वही मोक्ष है।”
इस कथन का आशय इच्छाओं का दमन नहीं, बल्कि उन पर विजय प्राप्त करना है। मनुष्य की प्रगति का आधार स्वस्थ आकांक्षाएँ हैं, किंतु जब इच्छाएँ ही जीवन का स्वामी बन जाएँ, तब वे आनंद नहीं, अशांति का कारण बनती हैं। आज का समाज उपभोग, प्रतिस्पर्धा और तुलना की दौड़ में इतना उलझ गया है कि सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी संतोष का धरातल खो देता है। परिणामस्वरूप बाहरी चमक बढ़ती है, पर भीतर का अंधकार भी गहराता जाता है।
भारतीय दर्शन
भारतीय दर्शन सदियों से कहता आया है कि वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मन की आसक्ति से मुक्त होने में है। मोक्ष का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी उसके मोह का बंधक न बनना है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देता है, अपेक्षाओं को संयमित करता है और परिणामों के प्रति अनावश्यक आसक्ति छोड़ देता है, तभी उसके भीतर शांति का उदय होता है। वही शांति जीवन को सार्थक बनाती है।
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आज मानसिक तनाव, अवसाद और असंतोष से जूझती दुनिया को धन या संसाधनों से अधिक संतुलित दृष्टि की आवश्यकता है। इच्छाओं का अंत विकास का अंत नहीं है; यह विवेकपूर्ण जीवन की शुरुआत है। संतोष ठहराव नहीं, बल्कि आत्मबल का सर्वोच्च रूप है। जो स्वयं पर विजय पा लेता है, उसे बाहरी विजय की आवश्यकता बहुत कम रह जाती है।
अंततः जीवन की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि हमने कितना अर्जित किया, बल्कि इस बात से कि हमने कितना त्यागा, कितना स्वीकारा और कितना शांत होकर जिया। क्योंकि वास्तविक मोक्ष मृत्यु के बाद मिलने वाली कोई रहस्यमयी अवस्था नहीं, बल्कि जाग्रत चेतना के साथ जीया गया वही जीवन है, जिसमें साँसें चलती रहती हैं, पर मन तमन्नाओं का दास नहीं रहता।
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-प्रभात दत्त झा बिलासपुर छत्तीसगढ़ ४९५००१
आलेख बुधवार क्रमांक -०१







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