तारीफ़

तारीफ़

 

चोरी चोरी शब्दों को चुराते हो,

तुम कविता मस्त सुनाते हो

 

दिल हथेली पर रख कर दिखाते हो,

नजरों से धड़कने धड़काते हो।

 

कविता की पंक्ति में महारानी बनाते हो,

शब्दों की पायल खूबसूरत पहनते हो।

 

कभी अपनाते हो कभी ठुकराते हो,

यार ये कैसा तन्हा सा प्यार लुटाते हो ।

 

तुम क्या जानो तकरार में बेपनाह प्यार है,

वहीं रूठने मनाने में तुम पे कुर्बान करता हूं।

 

मैं अनाड़ी ही सही मगर तुझे दिलो जान से चाहता हूं,

टूटी खिड़की से तेरा दीदार करने आता हूं।

 

तूं सदा मुस्कुराती रहे बस यहीं चाहता हूं,

तभी तो मदारी बन के तुझे रिझाता हूं।

 

तू नजरों से दूर रहे ये मुमकिन नहीं,

तभी तो तेरी डोर बेल बार-बार बजाता हूं।

तभी तेरे बाप की रोज गालियां खाता हूं,

तों कभी सालों से पीट करके आता हूं,।

 

सच तेरे लिए मर मिटने को भी तैयार हूं,

मौत का खौफ नहीं तभी तो गलियों में शोर मचाता हूं।

 

चोरी चोरी तेरे दिल को चुराता हूं,

मैं तेरी हां सुनने को तरस जाता हूं।

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शिवा सिंहल आबुरोड

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