*आख़री दीदार*
आख़री दीदार करने आई वो,
सर पर घूँघट डाल के,
दिल में तूफ़ान दबाए हुए,
आँखों में अश्क़ उबाल के।
कदम उसके कांप रहे थे,
सांसें भी ठहर-सी गईं,
दिल का दर्द लफ़्ज़ों में कैसे कहे,
बस आँखें से ही सब कह गईं।
मैं पड़ा था बेजान वहाँ,
जहाँ कभी तेरी बाहों में जिया,
अब तो बस यादें रह गईं,
जो हर साँस में समाया था, वो चला गया।
हवा भी आज धीमी थी,
सूरज भी जैसे बुझ गया,
तेरी सिसकियों की आहट ने,
मेरा बेजान दिल भी छू लिया।
तेरी साड़ी का पल्लू भीग गया,
तेरे अश्कों से लथपथ हुआ,
जिस चेहरे पर हँसी खिलती थी,
आज वहाँ बस दर्द ही दर्द लिखा हुआ।
तेरा वो काँपता हाथ,
जो मेरे माथे तक आया,
लगा जैसे मेरी रूह ने भी,
उस छुअन को फिर से पाया।
भीड़ में भी तन्हा थी तू,
कोई दिलासा भी अधूरा था,
तेरे बिना मैं अधूरा था,
अब तू भी अधूरी थी।
शायद ये तक़दीर का खेल था,
या फिर क़िस्मत की साज़िश,
हमारा प्यार मुकम्मल न हुआ,
बस रह गई एक अधूरी ख़्वाहिश।
तूने जो घूँघट हटाया,
तेरी आँखों ने सब कहा,
मुझे ख़ुदा से शिकवा न था,
पर तेरी हालत देख दिल दहला।
अब हम फिर न मिल सकेंगे,
बस ख़्वाबों में रहा करेंगे,
तू मुझे यादों में रख लेना,
मैं तुझे हवाओं में महसूस किया करूँगा।
अब विदा ले ले ऐ मेरी जान,
आँखों में आँसू ना ला,
जहाँ भी रहूँ मैं तेरा हूँ,
तेरा था और तेरा ही रहूँगा।
*कुंदन राज दत्ता “निश्छल”*








