अकेले ही ढ़ले हैं
अकेले ही ढ़ले हैं जहां सारा हैं अपना हम यही माने चले हैं परख कर दुख ही तो होगा अनाड़ी ही भले हैं झुलसने का ना हम को ड़र लगे ये खेल अब तो तपन को बाहों में ले कर अंधेरों में जले हैं हज़ारों रातें गहरी चाँद तक तक के ही काटी उसे मामा … Read more