Abhi is lekh ko 84 log padh rahe hain

अकेले ही ढ़ले हैं

अकेले ही ढ़ले हैं जहां सारा हैं अपना हम यही माने चले हैं परख कर दुख ही तो होगा अनाड़ी ही भले हैं झुलसने का ना हम को ड़र लगे ये खेल अब तो तपन को बाहों में ले कर अंधेरों में जले हैं हज़ारों रातें गहरी चाँद तक तक के ही काटी उसे मामा … Read more